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  1. यहां सड़कों पर घूमते बेजुबान जानवरों (कुत्ते, बिल्ली, बकरी) को कटोरे व
    प्लेट में खाना खिलाया जाता है और उनके सोने के लिए गद्दों का बिछौना
    तैयार किया जाता है. वहीं कम उम्र के जानवरों को बोतल से दूध पिलाया जाता
    है. यह नजारा है मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक आवास का. यह आवास
    सड़क पर घूमते जानवरों का आश्रय स्थल बन गया है.

    नरसिंहपुर की ऋचा प्रियदर्शी के लिए जानवरों के दुख दूर करना ही जीवन का
    मकसद हो गया है. वह बताती हैं कि एक बार सड़क पर पड़े बीमार कुत्ते की
    हालत को देखकर उनका दिल पसीज गया और वे उसे अपने घर ले आईं, उसकी
    सेवा-खुशामद कर उन्हें सुख की अनुभूति हुई. फिर उनके मन में ऐसा विचार
    उपजा कि जानवरों की सेवा ही उनके जीवन का ध्येय बन गया.

    ऋचा को अपने इस मकसद को पूरा करने में मां माधुरी का भी पूरा साथ मिल रहा
    है. माधुरी केंद्रीय विद्यालय की प्राचार्य रही हैं और सेवानिवृत्त होने
    के बाद बेटी के पशुसेवा अभियान में साथ निभा रही हैं.

    सड़क पर घूमते व बीमारी से लड़ते कुत्ते, बिल्ली, बकरी आदि जब भी ऋचा को
    नजर में आते हैं, वह उन्हें अपने घर लेकर आ जाती हैं. इतना ही नहीं, इन
    जानवरों को अपने हाथ से खाना खिलाती हैं और उनकी देखभाल करती हैं. उनके
    घर में जानवरों के सोने के लिए बाकायदा बिस्तर का इंतजाम है और खाने के
    लिए बर्तन भी हैं. जब कोई जानवर उम्र में बहुत छोटा होता है या उसकी
    तबीयत ज्यादा खराब होती है तो उसे बोतल के जरिए दूध पिलाया जाता है.

    ऋचा ने एमए की डिग्री के साथ कानून की उपाधि भी हासिल की है. उन्हें
    बीमार जानवरों की सेवा करने में सुख की अनुभूति होती है. वह कहती हैं कि
    आदमी तो दगा दे जाता है, औलादें तक अपने मां-बाप को लात मारकर चल देती
    हैं, मगर जानवर ऐसा नहीं करते. इन बेजुबान जानवरों की नजरों में वफा देखी
    जा सकती है. यही कारण है कि वह इंसान की बजाय जानवरों को अपना दोस्त
    मानती हैं.

    ऋचा व उनकी मां माधुरी ने मृत्यु उपरांत अपनी देह चिकित्सा महाविद्यालय
    को देने का ऐलान किया है. वे चहती हैं कि चिकित्सा छात्र उनकी देह के
    जरिए अपना शिक्षण कार्य पूरा कर समाज की सेवा करें.
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