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  1. किसी एक गांव के किनारे बने तालाब के पास हंस और हँसनी का जोडा रहता था |
    दोनो का ही जीवन सुखमय व्यतीत हो रहा था | एक दिन हँसनी ने हंस से कहा-
    आओ कहीं दूर की सैर करने चलते है, कुछ मन भी बहलेगा | हंस ने भी हामी भरी
    और दोनो उड़ चले | उड़ते -उड़ते जब शाम होने को आई तो हँसनी ने हंस से
    कहा- आओ यहीं इस पेड़ पर बसेरा ले लेते हैं | काफ़ी थक भी गये है | हंस
    ने कहा- ठीक है | और वह हंस और हँसनी पेड़ की एक शाखा पर बैठ गये | कुछ
    देर बाद हँसनी ने पास के एक गांव्र पर नज़र डालकर हंस से कहा- देखो तो
    सही यहाँ से वहाँ दूर-दूर तक सन्नाटा है कोई रोशनी भी नही है,

    यहाँ ऐसा वीराना आख़िर क्यों है ? हंस ने कहा- बात तो तुम्हारी सत्य
    प्रतीत होती है | मुझे ऐसा लगता है कि शायद यहाँ कोई उल्लू रहता है, इसी
    कारण यहाँ दूर-दूर तक वीराना छाया हुआ है | उसी पेड़ पर बनी एक खोह में
    उल्लू बैठा था जो उनकी बातों को बढ़े ध्यान से सुन रहा था | उसे सुनकर
    क्रोध तो बहुत आया, लेकिन कुछ सोचकर चुप रहा |

    अगले दिन सुबह के समय हंस और हँसनी वापस उड़ने के लिए उद्धत / तैयार हुए
    , तभी उल्लू ने हँसनी को पकड़ लिया और हंस से कहा- अब तुम जाओ यह हँसनी
    अब मेरी है | उल्लू ने फिर कहा - मैने कहा न क़ि यह हँसनी मेरी है | जाओ
    यहाँ से | हंस ने कहा - ऐसा कैसे हो सकता है, हँसनी तो मेरी है | बात
    बढ़ती गयी परंतु उल्लू ने हँसनी को मुक्त करने से मना कर दिया | हंस
    निराश सा होने लगा | हंस ने पुनः विनती की, कि मेरी हँसनी को मुक्त कर दो
    |

    उल्लू ने हंस के चेहरे पर निराशा को देखकर कहा - यदि इस गांव की पंचायत
    यह फ़ैसला दे देगी कि यह हँसनी तुम्हारी है तो मैं हँसनी को मुक्त कर
    दूँगा | थक - हारकर हंस ने उसी गांव की पंचायत में गुहार लगाई | और
    आख़िरकार पंचायत बैठी | हंस ने हँसनी को अपना बताते हुए अपना पक्ष रखा |
    और उल्लू ने कहा - पंच महोदय ! यह हँसनी तो मेरी है, यह हंस झूठ बोल रहा
    है | दोनो की बातें सुनकर पंचायत ने आपस में विचार-विमर्श करना शुरू कर
    दिया |

    एक पंच ने कहा - बचपन में मेरी नानी एक कहानी सुनाती थी जिसमें वह उल्लू
    और हँसनी के जोड़े की बात कहती थी | दूसरे पंच ने कहा- बात तुम्हारी ठीक
    लगती है, मेरे दादाजी भी कहा करते थे कि उन्होने ने भी एक हँसनी और उल्लू
    का जोड़ा देखा भी था | तीसरे पंच ने कहा - मेरे बाबा ने भी एक किस्सा
    सुनाया था उसमे भी उन्होने हँसनी और उल्लू का जोड़ा होने की बात बताई थी
    | इसी प्रकार चौथे और पाँचवें पंच ने भी उन सबकी हाँ में हाँ मिलाते हुए,
    हँसनी और उल्लू का जोड़ा होने की बात का समर्थन कर दिया | आख़िरकार
    पंचायत ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए हँसनी को उल्लू को सौपने के आदेश दे
    दिए | हंस और हँसनी फ़ैसला सुनकर घोर निराशा से भर गये | हँसनी और हंस
    दोनो की आँखों में आँसू आ गये | हंस मायूस हो गया |

    हंस दुखी मन से आँखों में आँसू लिए उड़ने को उद्धत हुआ तो उल्लू ने हंस
    को रोक लिया और उससे कहा - तुम कल रात पेड़ पर बैठकर हँसनी को क्या समझा
    रहे थे ? तुम्हें शायद याद नहीं आ रहा है, मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ |
    हँसनी ने तुमसे यह पूछा था कि इस गांव में इतना सन्नाटा क्यों है ? ऐसा
    क्यों लगता है कि गांव में कोई दिया जलाने वाला तक नहीं है ? तो तुमने
    कहा - कि यहाँ ज़रूर कोई उल्लू रहता होगा तभी इतना यहाँ सन्नाटा है |

    अब तुम मुझे यह बताओ कि गांव में यह वीराना/सन्नाटा मेरी वजह से है या इन
    पंचों कि वजह से है ? जिन्होंने तुम्हारी हँसनी मुझे सौंप दी | जब पंचायत
    ऐसी होगी तब गांव में वीराना नही होगा तो क्या होगा ? हँसनी तुम्हारी है
    और तुम्हारी ही रहेगी | यह कहकर उल्लू ने हँसनी को हंस के सुपुर्द कर
    दिया | बात कहते-कहते उल्लू का गला भर आया था और उसकी आँखों में भी आँसू
    आ गये थे ..................| हंस ने उल्लू से माफ़ी माँगी और उल्लू को
    धन्यवाद देते हुए हंस और हँसनी वापस उड़ गये |

    Name: TRIBHUWAN KISHOR

    Email: tribhuwankishor1000@gmail.com

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