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लिखिए अपनी भाषा में

  1. PHOTO: फांसी से पहले 6.25 बजे अफजल ने लिखा था यह आखिरी खत, इसे खोलते ही रो पड़ा पूरा परिवार
    जम्मू/नई दिल्ली. संसद पर हमले के लिए मौत की सजा पा चुके अफजल गुरु ने 9 फरवरी को फांसी दिए जाने से कुछ समय पहले उर्दू में 10 लाइनों की एक चिट्ठी अपनी पत्नी के नाम लिखी थी। इस चिट्ठी में अफजल ने इस बात के लिए खुदा का शुक्रिया अदा किया था कि 'ऐसी अहमियत और कद' के लिए उसे चुना गया। अफजल ने चिट्ठी में अपने परिवार से अपील की थी कि शोक मनाने की जगह उन्हें इसका (फांसी का) सम्मान करना चाहिए। चिट्ठी में अफजल ने ऊपर तारीख के तौर पर 09-02-2013 लिखा और समय के रूप में 6.25 बजे दर्ज किया। 
     
    चिट्ठी में अफजल ने परिवार के लिए कोई निजी संदेश नहीं लिखा बल्कि सत्य और इंसाफ की ही बातें कीं। अफजल ने लिखा, 'अल्लाह का लख-लख शुक्रिया कि उसने मुझे इस कद के लिए चुना। ऐसा मानने वालों को मेरी मुबारकबाद। हम सब लोग सच और इंसाफपसंदी के लिए हमेशा खड़े रहे और हमारा अंत भी सच और इंसाफ की राह पर होना चाहिए। अपने परिवार से मेरी प्रार्थना है कि गम में डूबने की जगह उन्हें उस कद का सम्मान करना चाहिए जो मुझे मिला है। अल्लाह तुम्हारा सबसे बड़ा रक्षक और मददगार है।' 
     
    अफजल की चिट्ठी के मतलब के बारे में जब उसके रिश्तेदार यासिन से पूछा गया तो उसने कहा, 'यह कश्मीर के लोगों पर निर्भर है कि वह इसका क्या मतलब समझते हैं।' वहीं, हुर्रियत नेता मोहम्मद अशरफ सहराई ने अफजल की चिट्ठी को 'संघर्ष के जीवन की एक थाती' करार दिया। सहराई के मुताबिक, 'चिट्ठी से साफ है कि फांसी पर चढ़ने से पहले उसे कोई पछतावा नहीं था और वह संतुष्ट होने के साथ ही शुक्रमंद था। अफजल ने कश्मीर को यह संदेश दिया है कि सच के लिए संघर्ष करते रहो।' 
     
    अफजल के भाई यासीन गुरु ने मीडिया को बताया कि यह चिट्ठी उन्‍हें दो दिन बाद मिली, लेकिन इसे कुछ दिन बाद खोला गया और इसे खोलते ही पूरा परिवार रो पड़ा था।
     
    (तस्वीर में: अफजल की आखिरी चिट्ठी जिसमें लिखा था,
     
    'सुबह के 6: 25                          9.2.2013 
     
    बिस्मिल्लाहिर्रहमानअर्रहीम
    मोहतरम अहले ख़ाना (परिवार) और अहले ईमान (ईमान वालों) अस्सलाम अलैकुम. 
    अल्लाह पाक का लाख शुक्रिया कि उसने मुझे इस मुक़ाम के लिए चुना. बाक़ी मेरी तरफ़ से आप तमाम अहले ईमान (ईमान वालों) को भी मुबारक हो कि हम सब सच्चाई और हक़ के साथ रहे और हक़ो सच्चाई की ख़ातिर आख़िरत हमारा इख़्तिताम (अंत) हो - अहले ख़ाना को मेरी तरफ़ से गुज़ारिश है कि मेरे से इख़्तेताम (अंत) पर अफ़सोस की बजाए वो इस मक़ाम का एहतराम (सम्मान) करें. अल्लाह पाक आप सबका हाफ़िज़ ओ नासिर (सुरक्षा करने वाला और मददगार) है.
    अल्लाह हाफ़िज़.')
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