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  1. [जन्म 5 जून 1723 (रूस) – निधन 17 जुलाई 1790 (न्यूयॉर्क)]

    'द वेल्थ ऑफ नेशंस' के साथ एडम स्मिथ ने खुद को समकालीन आर्थिक सोच के
    प्रमुख के तौर पर स्थापित कर लिया था। एडम स्मिथ की सोच की यही ऊर्जा
    19वीं सदी में डेविड रिकार्डो और कार्ल मार्क्स और फिर 20वीं सदी में
    कीन्स और फ्रीडमैन तक देखने को मिली।

    स्मिथ का जन्म स्कॉटलैंड के एक छोटे से गांव कर्क हैडली में हुआ था। 14
    वर्ष की उम्र में स्कॉलरशिप (जैसा कि उन दिनों प्रचलन में था) पर
    यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में दाखिले से पहले तक उनकी देखभाल विधवा मां ने
    की। बाद में उन्होंने ऑक्सफोर्ड के बेलियल कॉलेज में दाखिला ले लिया। जब
    वे स्नातक हुए तो उनके पास यूरोपियन साहित्य का अच्छा खासा ज्ञान था और
    और साथ ही था अंग्रेजी स्कूलों के लिए एक स्थायी तिरस्कार भाव। वे घर
    लौटे और कई पसंद किए गए लेक्चरों की सीरीज के बाद उन्होंने ग्लास्गो
    यूनिवर्सिटी में 1751 में 'फर्स्ट चेयर ऑफ लॉजिक' और फिर अगले साल (1752)
    में 'चेयर ऑफ मॉरल फिलासॉफी' की स्थापना की। 1764 में शिक्षा जगत छोड़कर
    वो यंग ड्यूक ऑफ बुस्ल्यूच को ट्यूशन देने लगे। दो साल तक स्मिथ ने पूरे
    दो साल फ्रांस में रहने और वहां घूमने में बिताए। वे इस दौरान
    स्विट्जरलैंड भी गए। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने स्मिथ को उनके समकालीन
    वोल्तेयर, जीनजैस रोस्यू, फ्रैंकॉयस वेसने और आयनरॉबर्टजैस टरगट के
    संपर्क में ला दिया।

    ड्यूक की सेवा से मिली पेंशन मिलने के बाद स्मिथ सेवानिवृत्त होकर अपने
    जन्म स्थान कर्क हैडली लौटकर 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' लिखने में जुट गए। यह
    उसी वर्ष 1776 में प्रकाशित हुई जब अमेरिका में स्वाधीनता के घोषणा-पत्र
    पर हस्ताक्षर हुए थे। इसी साल उनके नजदीकी दोस्त डेविड ह्यूम का भी निधन
    हुआ। 1778 में कमिश्नर ऑफ कस्टम्स नियुक्त किया गया। इस नये काम ने उनको
    उलझन में डाल दिया। अब उन पर स्मगलिंग पर अंकुश की जिम्मेदारी थी, जबकि
    स्मगलिंग को अपनी किताब 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' में वे 'अस्वाभाविक' कानूनों
    के कारण जायज करार दे चुके थे। एडम स्मिथ ने शादी नहीं की। 19 जुलाई 1790
    को उनका एडिनबर्ग में निधन हो गया।

    आज स्मिथ की ख्याति उनकी इस व्याख्या के कारण है कि मुक्त बाजार वाली
    अर्थव्यवस्था में कैसे तार्किक स्वार्थ भी आर्थिक तरक्की का कारण बन सकता
    है। ये उन लोगों को चौंका सकता है जो स्मिथ को उनके नीति शास्त्र और भलाई
    पर आधारित उनके शुरूआती काम के लिए जानते हैं। वे तो उन्हें एक निष्ठुर
    व्यक्तिवादी मानते थे। वास्तविकता में यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में स्मिथ
    ने जिन विषयों पर लेक्चर दिए जैसे- प्राकृतिक धर्मशास्त्र (नेचुरल
    थियालॉजी), नीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र और अर्थशास्त्र। ये खुलासा उस
    दौरान उनके छात्र रह चुके जॉन मिलर ने किया है।

    'थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स' में स्मिथ लिखते हैं, 'इंसान को कितना भी
    स्वार्थी मान लिया जाए, लेकिन फिर भी उसके स्वभाव में ऐसे कुछ मतों के
    सबूत तो मिल ही जाते हैं, जो उसे दूसरों के हितों के लिए भी सोचने का
    मौका देते हैं और उसमें दूसरों की खुशी की अनिवार्यता का भाव भर देती
    हैं, हालांकि इससे उसे निजी तौर पर कोई फायदा तो नहीं होता, लेकिन दूसरों
    को खुश देखने का आनंद मिलता है।' दूसरी तरफ, निजी हितों को लेकर स्मिथ के
    विचारों में मृदुता भी देखने को मिलती है। वे इस विचार को नहीं मानते कि
    स्वप्रेम 'एक ऐसा मत है जो किसी भी सूरत में पवित्र नहीं हो सकता।' स्मिथ
    का तर्क था कि जिंदगी की मुश्किलें बढ़ जाएंगी अगर, 'हमारा स्नेह, जो
    हमारे मूल स्वभाव का हिस्सा है, हमारे व्यवहार को अधिकांशतया प्रभावित कर
    सकता है, किसी भी मौके पर पवित्र न लगे या इसे हर किसी से तारीफ ही
    मिले।'

    स्मिथ के लिए दयाभाव और निजी हित एक दूसरे के विरोधी नहीं थे, वे तो पूरक
    थे। 'इंसान के पास अपने लोगों की मदद के मौके निरंतर उपलब्ध होते हैं,
    लेकिन ऐसा केवल परोपकार से ही करने की सोच व्यर्थ होगी।' यह खुलासा
    उन्होंने अपनी किताब 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' में किया है।

    धर्मार्थ कार्य जहां एक नेक काम है, केवल इसी से गुजारा नहीं हो सकता। इस
    कमी को निजी हितों की पूर्ति ही पूरा कर सकती है। स्मिथ के मुताबिक,
    'किसी कसाई, बीयर बनाने वाले या बेकरी वाले के परोपकार से हम रोज रात का
    खाना हासिल करने की अपेक्षा नहीं कर सकते, बल्कि तभी कर सकते हैं जब वे
    अपने हितों का सम्मान करें।'

    अपने श्रम से पैसे कमाने वाला खुद का फायदा करता है। साथ ही वह बिना जाने
    समाज को भी फायदा पहुंचाता है। क्योंकि वह अपने श्रम का पैसा
    प्रतिस्पर्धी बाजार से कमाता है, वो दूसरों से बेहतर ऐसा काम करता है
    जिसके लिए उसे पैसा मिलता है। एडम स्मिथ की स्थायी परिकल्पना में,
    'उद्योग को उसकी कीमत के मुताबिक सक्षमता के साथ चलाने में उसका मकसद
    अपना लाभ होता है। साथ ही इसमें, अन्य कई मामलों की तरह उसे एक अनदेखे
    साथ से वह तरक्की मिल रही है, जो उसकी आकांक्षा में शामिल ही नहीं था।'

    'द वेल्थ ऑफ नेशंस' की पांच किताबों की सीरीज में किसी देश की समृद्धि और
    उसके स्वभाव का खुलासा किया गया है। स्मिथ का तर्क था कि समृद्धि का
    मुख्य कारण, श्रम का निरंतर बढ़ता विभाजन था। स्मिथ ने पिन का बहुचर्चित
    उदाहरण दिया था। उन्होंने बताया कि अगर 18 विशेषज्ञता वाले कामों में से
    प्रत्येक को किसी विशेष श्रमिक को दिया जाए तो 10 श्रमिक प्रतिदिन 48
    हजार पिनों का उत्पादन कर सकते हैं। औसत उत्पादनः 4800 पिन प्रति
    व्यक्ति प्रतिदिन। लेकिन श्रम का विभाजन मत कीजिए तो एक श्रमिक दिन भर
    में एक पिन भी बना ले तो बहुत है। सीरीज की पहली किताब इसी विषय पर
    केंद्रित है कि कैसे श्रमिक अपनी श्रमशक्ति का या अन्य संसाधनों का बेहतर
    इस्तेमाल कर सकते हैं। स्मिथ ने दावा किया कि एक व्यक्ति किसी संसाधन,
    जैसे जमीन या श्रमिक, का निवेश इसीलिए करता है, ताकि उसे बदले में ज्यादा
    से ज्यादा लाभ मिले। परिणामतः संसाधन का सभी तरह से इस्तेमाल समान लाभ
    (हर एक में मौजूद तुलनात्मक जोखिम के लिहाज से समायोजित) मिलना चाहिए।
    वरना स्थानांतरण देखने को मिलेगा।

    जॉर्ज स्टिगलर की राय में यह विचार ही आर्थिक सिद्धांत के मुख्य प्रमेय
    (प्रपोजिशन) के केंद्र में है। इसमें हैरानी की बात नहीं है. और फिर यह
    स्टिगलर के उस दावे से भी मेल खाता है कि अर्थशास्त्र में किसी भी सोच के
    जनक को उसका श्रेय नहीं मिलता, स्मिथ के विचार मौलिक नहीं थे। 1766 में
    फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टरगट इसी तरह के विचार व्यक्त कर चुके थे। स्मिथ
    ने समान लाभ की अपनी सोच के बूते इस बात का खुलासा कर दिया कि क्यों
    लोगों को अलग-अलग वेतन मिलता है। स्मिथ के अनुसार मुश्किल से सीखे जाने
    वाले काम के लिए मिलने वाला वेतन भी ज्यादा होगा, क्योंकि ज्यादा वेतन की
    संभावना नहीं होने पर लोग उस काम को सीखने में उत्साह ही नहीं दिखाएंगे।
    उनके विचारों ने ही मानव पूंजी की आधुनिक सोच को साकार किया। साथ ही उन
    लोगों को भी ज्यादा वेतन मिलेगा जो गंदे और ज्यादा जोखिम वाले कामों को
    करेंगे- जैसे कोयला खदानों में काम या कसाई का काम या फिर जल्लाद का काम
    जहां एक घृणित काम करना पड़ता है। संक्षेप में, काम में अंतर की भरपाई
    वेतन में अंतर से की जाती है। आधुनिक अर्थशास्त्री स्मिथ की इस सोच को
    'थ्योरी ऑफ कंपनसेटिंग वेज डिफरेंशियल्स' का नाम देते हैं।

    स्मिथ ने गणना के अर्थशास्त्र (न्यूमरेट इकानॉमी) का इस्तेमाल न केवल पिन
    के उत्पादन या कसाई और जल्लाद के वेतनों में अंतर को समझाने के लिए किया,
    बल्कि उनका उद्दे्श्य उस वक्त के कुछ राजनीतिक मुद्दों की ओर ध्यान
    दिलाना भी था। 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' की 1776 में प्रकाशित चौथी किताब में
    स्मिथ ग्रेट ब्रिटेन को बताते हैं कि अमेरिकी उपनिवेशों पर कब्जा फायदे
    का सौदा नहीं है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जरूरत से ज्यादा महंगे होने के
    कारणों के खुलासे से स्मिथ की आंकड़ों से खेलने की महारत का तो पता चलता
    ही है, साथ ही वह यह भी बताता है कि अर्थशास्त्र के बहुत सामान्य से
    इस्तेमाल से भी क्रांतिकारी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं

    एक महान साम्राज्य की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था ऐसे उपभोक्ता देश
    तैयार करना जो हमारे विभिन्न उत्पादकों से उनके द्वारा बनाए जा रहे हर
    सामान को खरीदें। हमारे उत्पादकों का एकाधिकार सुरक्षित रखने के लिए
    कीमतों में थोड़े से इजाफे का खामियाजा साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए
    अंततः घरेलू उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ गया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए
    पिछली दो जंग में 1.7 करोड़ से ज्यादा लोगों को काम पर लगाया गया और इससे
    पहले की जंगों में भी ऐसा होता रहा है। इस कर्ज का ब्याज ही न केवल समूचे
    असाधारण लाभ से ज्यादा है, जो औपनिवेशिक व्यापार पर एकाधिकार से कमाया
    गया था बल्कि पूरे कारोबार के मूल्य, पूरे सामान के मूल्य से भी ज्यादा
    है जो हर साल उपनिवेशों को आयात किया गया।

    स्मिथ हमेशा से वाणिज्यवाद के खिलाफ थे, जिसमें व्यापार अधिशेष (ट्रेड
    सरप्लस) को इस त्रुटिपूर्ण सोच के साथ कायम रखा जाता है कि इससे धन में
    इजाफा होता है। उनका तर्क था, कि व्यापार का मूल फायदा यह था कि इसने
    अतिरिक्त सामान के लिए नये बाजार खोल दिए और विदेशों से आने वाली चीजें
    भी घर पर सस्ती मिलने लगीं। इसके साथ ही स्मिथ ने मुक्त व्यापार के
    समर्थक अर्थशास्त्रियों की एक पीढ़ी के लिए रास्ता सा खोल दिया, जिस पर चल
    कर अगली पीढ़ी में डेविड रिकार्डो और जॉन स्टुअर्ट की तुलनात्मक लाभ के
    सिद्धांत रचे गए।

    कई बार एडम स्मिथ को एक ऐसे अर्थशास्त्री के तौर पर बताया गया जो आर्थिक
    जगत में सरकार की कोई भूमिका ही नहीं चाहते, जबकि वास्तविकता में उनका
    मानना था कि इसमें सरकार की भूमिका बहुत अहम है। मुक्त बाजार में यकीन
    रखने वाले अधिकांश आधुनिक विचारकों की तरह स्मिथ का भी यह मानना था कि
    सरकार को अनुबंधों के लिए दबाव बनाना चाहिए और नई सोच और आविष्कारों को
    प्रोत्साहित करने के लिए पेटेंट और कॉपीराइट भी देना चाहिए। उनका यह भी
    मानना था कि सरकार को सड़क और पुलों जैसे कामों को अपने पास ही रखना
    चाहिए, जो उनकी राय में निजी लोग अच्छी तरह से मुहैया नहीं करा पाएंगे।
    मजे की बात यह है कि वे यह भी चाहते थे कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल करने
    वालों से इस आधार पर वसूली की जानी चाहिए कि उन्होंने इसका कितना
    इस्तेमाल किया। यानी ज्यादा इस्तेमाल करने वाले से ज्यादा वसूली। स्मिथ
    और आधुनिक विचारकों में एक मुक्त बाजार को लेकर सबसे बड़ा अंतर यह है कि
    स्मिथ प्रतिकार दरों (रिटेलियटरी टेरिफ्स) के समर्थक थे।

    उनकी राय में दूसरे देशों की ऊंची दरों को कम करने में प्रतिकार करने का
    अच्छा असर होगा। उन्होंने लिखा था, 'एक अच्छे विदेशी बाजार की बेहतरी,
    कुछ समय के लिए कुछ सामान विशेष के लिए ज्यादा कीमत चुकाने की अस्थायी
    असुविधा की क्षतिपूर्ति कर देगी।' स्मिथ के कुछ विचार उनकी कल्पनाशक्ति
    की व्यापकता को प्रदर्शित करते हैं। आज वाउचरों और शालेय चयन कार्यक्रमों
    (स्कूल चॉइस प्रोग्राम्स) को सार्वजनिक शिक्षा के ताजातरीन सुधारों की
    संज्ञा दी जाती है। लेकिन एडम स्मिथ ने तो इस विषय की चर्चा 200 साल से
    भी ज्यादा पहले कर दी थी।

    अगर लाभार्थ संस्थानों पर निर्भर छात्रों को अपनी पसंद के कॉलेजों के चयन
    की छूट दी जाए तो इस आजादी से विभिन्न कॉलेजों में भी बेहतरी के लिए कुछ
    प्रतिस्पर्धा का भाव देखने को मिलेगा। इसके विपरीत हर एक कॉलेज से दूसरे
    कॉलेज जाने के इच्छुक छात्रों को रुकने पर मजबूर करने वाला कानून इस
    प्रतिस्पर्धा के भाव को समाप्त कर देगा।

    ऑक्सफोर्ड (1740-46) में अपने छात्र जीवन में आए अनुभवों ने, जहां वे
    शिकायत करते थे कि प्रोफेसरों ने पढ़ाने का नाटक तक करना छोड़ दिया है, एडम
    स्मिथ का हमेशा के लिए ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से मोहभंग कर दिया था।
    स्मिथ का लेखन न केवल अर्थशास्त्र के विज्ञान की पड़ताल करता है, बल्कि यह
    देशों को अपने संसाधनों को समझने में एक पॉलिसी गाइड की तरह भी था। स्मिथ
    का मानना था कि खुली प्रतिस्पर्धा के माहौल में ही सर्वश्रेष्ठ आर्थिक
    विकास हो सकता है। एक ऐसा माहौल जहां सर्वव्यापी 'प्राकृतिक नियम' से
    तालमेल रखा जाता हो। चूंकि स्मिथ उनके काल तक के सबसे ज्यादा व्यवस्थित
    और व्यापक अध्ययनकर्ता थे उनकी आर्थिक सोच मान्य अर्थशास्त्र का आधार बन
    गई। और चूंकि किसी अन्य अर्थशास्त्री की तुलना में उनकी सोच ज्यादा काल
    तक टिकी रही, इसलिए एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र के विज्ञान का आदि और अंत
    (अल्फा एंड ओमेगा) कहा जा सकता है।

    http://azadi.me

    एडम स्मिथ के चुनिंदा लेखन

    एन इन्वायरी इनटू दि नेचर एंड कॉजेस ऑफ दि वेल्थ ऑफ नेशंस, एडविन केनन
    द्वारा संपादित, 1976
    दि थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स, डी.डी. रैफेल और ए.एल. मैकफी द्वारा संपादित, 1976

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