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  1. सूफी संत जुनैद के बारे में एक कथा है.
    एक बार संत को एक व्यक्ति ने खूब अपशब्द कहे और उनका अपमान किया. संत ने
    उस व्यक्ति से कहा कि मैं कल वापस आकर तुम्हें अपना जवाब दूंगा.

    अगले दिन वापस जाकर उस व्यक्ति से कहा कि अब तो तुम्हें जवाब देने की
    जरूरत ही नहीं है.
    उस व्यक्ति को बेहद आश्चर्य हुआ. उस व्यक्तिने संत से कहा कि जिस तरीके
    से मैंने आपका अपमान किया और आपको अपशब्द कहे, तो घोर शांतिप्रिय व्यक्ति
    भी उत्तेजित हो जाता औरजवाब देता. आप तो सचमुच विलक्षण, महान हैं.

    संत ने कहा – मेरे गुरु ने मुझे सिखाया है कियदि आप त्वरित जवाब देते हैं
    तो वह आपके अवचेतन मस्तिष्क से निकली हुई बात होती है. इसलिए कुछ समय
    गुजर जाने दो. चिंतन मनन हो जाने दो. कड़वाहट खुद ही घुल जाएगी. तुम्हारे
    दिमाग की गरमी यूँ ही ठंडी हो जाएगी. आपके आँखों के सामने का अँधेरा जल्द
    ही छंट जाएगा. चौबीस घंटे गुजर जाने दो फिर जवाब दो.

    क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति पूरे 24 घंटों के लिए गुस्सा रह
    सकता है? 24 घंटे क्या, जरा अपने आप को 24 मिनट का ही समय देकर देखें.
    गुस्सा क्षणिक ही होता है, और बहुत संभव है कि आपका गुस्सा, हो सकता है
    24 सेकण्ड भी न ठहरता हो.

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  2. कमलनाथ एक सफल व्यापारी थे. उन्हें नींद न आने की बीमारी थी. उनका
    नौकर रामदीन अपने मालिक की बीमारी से दुखी रहता था. एक दिन व्यापारी कमल
    नाथ अपने नौकर रामदीन को सारी संपत्ति देकर चल बसा. संपत्ति का स्वामी
    बनने के बाद रामदीन रात को सोने की कोशिश कर रहा था, किन्तु अब उसे नींद
    नहीं आ रही थी. एक रात जब वह सोने की कोशिश कर रहा था, उसने कुछ आहट
    सुनी. रामदीन ने देखा, एक चोर घर का सारा सामान समेट कर उसे बांधने की
    कोशिश कर रहा था, लेकिन चादर छोटी होने के कारण गठरी बंध नहीं रही थी.

    नौकर रामदीन ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला, सारा सामान
    इसमें बांध लो. उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा. किन्तु नौकर
    रामदीन ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा, भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि
    मैं चैन की नींद सो सकूँ. इसी ने मेरे मालिक की नींद उड़ा रखी थी और अब
    मेरी भी. उसकी बातें सुन चोर की भी आंखें खुल गईं.

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  3. कुरु प्रदेश का राजकुमार भगवान श्रीकृष्ण का भक्त था। उसने संकल्प लिया
    कि अपना समस्त जीवन वह वृंदावन में बिताएगा। वृंदावन पहुंचकर यमुना तट पर
    उसने कुटिया बनाई और पूजा-उपासना करने लगा।

    एक बार मगध के राजा सपरिवार वृंदावन पहुंचे। जब राजा-रानी यमुना स्नान
    करने जा रहे थे, तब वृक्ष के नीचे उपासना में लीन साधु (राजकुमार) को
    देखकर वे रुक गए। साधु की समाधि पूरी होने के बाद मगधराज ने
    विनम्रतापूर्वक कहा, तपस्वी, मुझे आपके चेहरे से आभास होता है कि आप कहीं
    के राजकुमार तो नहीं?

    साधु ने कहा, राजन, भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला-भूमि में न तो कोई
    राजकुमार होता है और न राजा। श्रीकृष्ण अपने सखा ग्वालों को भी गले लगाते
    थे, इसलिए यहां कुल-जाति का विचार अधर्म है।

    राजा युवा तपस्वी के वचनों से प्रभावित हुए। उन्होंने अनुरोध किया, आप
    हमारे साथ चलें। अभी आप युवक हैं। हम आपका विवाह अपने कुल की कन्या से
    करा देंगे। आप कभी दुखी नहीं रहेंगे। यह सुनकर साधु ने पूछा, क्या राजा व
    धनवान को कभी दुख नहीं सताता?

    क्या राजा व गृहस्थ के परिवार में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती? फिर
    सुख से रहने की बात कहकर आप मुझे साधना से विरत क्यों करना चाहते हैं?
    श्रीकृष्ण की भक्ति में मुझे अनूठा सुख मिलता है। राजा ने युवा साधु को
    गुरु मान लिया और स्वयं भी राजपाट त्यागकर वृंदावन में रहने लगे।

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  4. बहुत पुरानी कथा है। यूनान में एक व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक
    संत के पास पहुंचा। उसने संत को प्रणाम कर उनसे कहा-महात्मा जी, मेरे
    जीवन में कुछ प्रकाश हो जाए, ऐसा कुछ ज्ञान देने की कृपा करें। इस पर संत
    बोले- भाई मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूं। मैं भला तुम्हें क्या ज्ञान
    दूंगा। यह सुनकर उस व्यक्ति को हैरानी हुई।


    उसने कहा-ऐसा कैसे हो सकता है। मैंने तो कई लोगों से आपके बारे में सुना
    है। इस पर संत बोले- तुम्हें ज्ञान चाहिए तो सुकरात के पास चले जाओ। वही
    तुम्हें सही ज्ञान दे सकेंगे। वे ही यहां के सबसे बड़े ज्ञानी हैं। वह
    व्यक्ति सुकरात के पास पहुंचा और बोला-महात्मा जी, मुझे पता लगा है कि आप
    सबसे बड़े ज्ञानी हो। इस पर सुकरात मुस्कराए और उन्होंने पूछा कि यह बात
    उससे किसने कही है।


    उस व्यक्ति ने उस महात्मा का नाम लिया और कहा-अब मैं आपकी शरण में आया
    हूं। मेरे उद्धार का कोई उपाय बताएं। इस पर सुकरात ने जवाब दिया- तुम
    उन्हीं महात्मा जी के पास चले जाओ। मैं तो साधारण ज्ञानी भी नहीं हूं
    बल्कि मैं तो अज्ञानी हूं। यह सुनने के बाद वह व्यक्ति फिर उस संत के पास
    पहुंचा। उसने संत को सारी बात कह सुनाई।
    इस पर संत बोले- भाई सुकरात जैसे व्यक्ति का यह कहना कि मैं अज्ञानी हूं,
    उनके सबसे बड़े ज्ञानी होने का प्रमाण है। जिसे अपने ज्ञान का जरा भी
    अभिमान नहीं होता वही सच्चा ज्ञानी है। उस व्यक्ति ने इस बात को अपना
    पहला पाठ मान लिया।

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