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  1. अक्सर युवा पढ़ाई के बाद अच्छे जॉब की तलाश में रहते हैं। अगर वे किसी
    कॉर्पोरेट सेक्टर में जॉब करते भी हैं तो वहां की सेलरी और सुविधाओं से
    वे संतुष्ट नहीं रहते। ऐसे में युवाओं को नौकरी का मोह छोड़कर बिजनेस को
    भी करियर के रूप में चुनना चाहिए। कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जिनमें बिजनेस
    किया जा सकता है।

    पर्यटन
    भारत में पर्यटन का क्षेत्र काफी तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय और
    अंतरराष्ट्रीय पर्यटन में तेजी से प्रगति हुई है। भारत को दुनिया में एक
    अच्छा पर्यटक स्थल माना जाता है। यहां ऐतिहासिक स्थल विदेशी सैलानियों को
    अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस क्षेत्र में योग्य प्रोफेशनल्स की भारी कमी
    है। पर्यटन के साथ ही होटल इंडस्ट्री भी जुड़ी हुई है इस क्षेत्र में भी
    काफी मांग है और वर्तमान की बात की जाए तब बजट होटल्स को विदेशी काफी
    पसंद करते हैं।

    ऑटोमोबाइल
    देश का ऑटोमोबाइल क्षेत्र काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। विश्व के
    ऑटोमोबाइल मार्केट को भारत से ही जरूरी कल पुर्जे भेजे जाते हैं। भारत
    में इंजीनियरिंग बेस काफी अच्छा होने के कारण विश्व की कई अग्रणी कार
    निर्माताओं ने भारत में निर्माण आरंभ किए हैं। इस क्षेत्र में कार
    निर्माताओं को कई छोटे कलपुर्जों को जरूरत पड़ती रहती है अगर किसी एक
    क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर बिजनेस आरंभ किया जाएं तब यह नौकरी से काफी
    अच्छा रिटर्न देगा।

    टेक्सटाइल

    दुनियाभर में भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की अलग पहचान है। हमारे देश में
    टेक्सटाइल के क्षेत्र में इतनी विविधता है कि प्रत्येक राज्य में अलग
    स्टाइल के कपड़े पहने जाते हैं। देश में लुधियाना से लेकर कई ऐसे शहर हैं
    जहां से कपड़ों का निर्यात होता है। आप इस क्षेत्र में जाना चाहते हैं तब
    छोटे स्तर से बिजनेस आरंभ कर सकते हैं। देश के भीतर भी इस क्षेत्र में
    विकास की दर काफी अच्छी है।

    सामाजिक क्षेत्र
    सामाजिक क्षेत्र काफी तेजी से विकसित हो रहा है। इसमें आप ग्रामीण
    क्षेत्रों में बिजनेस लगा सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़े-लिखे
    युवाओं की संख्या भी कम नहीं है। उन्हें थोड़ा बहुत प्रशिक्षण देकर आप
    अपना बिजनेस आरंभ कर सकते हैं। सरकार के द्वारा भी ऐसे क्षेत्रों में
    बिजनेस करने वालों को प्रोत्साहित किया जाता है। इसके अलावा रिसाइकलिंग,
    एनर्जी सोल्युशन्स, एवं बायोटेक्नोलाजी के क्षेत्र में भी बिजनेस आरंभ
    किया जा सकता है।

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  2. इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सनेल सिलेक्‍शन(आईबीपीएस) के जर‌िए स्पेशलिष्ट
    ऑफिसर केडर(एसपीएल-III) की भर्ती के लिए एक परीक्षा का आयोजन किया जाएगा।
    इसके लिए व‌िज्ञप्त‌ि जारी कर दी गई है। इसके तहत 21 सार्वजन‌िक क्षेत्र
    के बैंकों से विशिष्‍ट अधिकार‌ियों की भर्ती के लिए परीक्षा होगी।

    इसके लिए 8 फरवरी और 9 फरवरी 2014 को एक सम्मिलित लिखित परीक्षा का आयोजन
    किया जाएगा। इस परीक्षा में जो सफलता प्राप्त करेंगे, उनको अंकों के आधार
    पर आईआईएम के कैट एक्जाम की तरह अंक निर्धारण किया जाएगा और उनको
    साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा तथा विज्ञप्ति के अनुसार सफल घोषित किया
    जाएगा।

    इन विशिष्ट अधिकार‌ियों के पदों में सूचना प्रोद्यौगिकी अध‌िकारी, कृषि
    क्षेत्र अध‌िकारी, राजभाषा अध‌िकारी, विधि अध‌िकारी, एचआर, विपणन
    अध‌िकारी, चार्टर्ड अकाउंटेंट, मैनेजर क्रेडिट तथा फाइनेंस एक्जीक्यूटिव
    के पद शाम‌िल हैं।

    इस परीक्षा में आवेदन करने के लिए आवेदक 14 दिसंबर 2013 तक आईबीपीएस की
    वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

    इन पदों के संबंध में आवश्यक योग्यता, आयु और अन्य सभी महत्वपूर्ण
    जानकारी के लिए वेबसाइट
    http://www.ibps.in/career_pdf/Draft_ad_Specialist_Officers_III.pdf पर
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  3. कैरियर सलाह डॉट कॉम में आज भारत में उपलब्ध तमाम सामान्य व्यावसायिक,
    गैर व्यावसायिक व तकनीकी कोर्स से सम्बन्धित जानकारियां उपलब्ध हैं, जहां
    से आप किसी भी तरह की मदद या सुझाव मांग सकते हैं।

    साइट द्वारा छात्र-छात्राओं को इस बात के लिए तैयार किया जाता है कि वे
    अपने लिये कैरियर का चुनाव किसी भी तरह चांस से नहीं सदैव अपने च्वाइस से
    हीं करें।

    पिछले एक दशक में शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में सैकड़ों ऐसे अवसर पैदा
    हुए हैं जिसके बारें में अधिकांश लोगों को आज भी कोई जानकारी नहीं।
    माता-पिता अपनी अपूर्ण इच्छा व आकांक्षा अपने बच्चों पर थोप देते हैं तथा
    बच्चे भी पर्याप्त जानकारी के अभाव में या फिर पारिवारिक अनुशासन का
    लिहाज करते हुए अनिच्छापूर्वक उसी कोर्स-विशेष को अपनाने के लिए मजबूर
    होते हैं। हालांकि यह सबसे खतरनाक स्थिति होती है और उसके नतीजे भी
    कालान्तर में कष्टदायक ही होते हैं।

    आज उच्च शिक्षा मे सिर्फ उन्ही लोगों को जाना चाहिए जिनकी दिलचस्पी वाकई
    अध्ययन तथा शोध मे है, अन्यथा उन्हे देश मे उपलब्ध अन्य अवसरो मे से ही
    अपने भविष्य की सुरक्षा की तलाश करनी चाहिए। आज स्पोर्टस, मेडिसिन,
    बॉयोटेक्लॉजी, कास्मेटॉलॉजी, फैशन, डिजायन तथा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों
    में सैकड़ों स्वर्णिम संभावनाएं उपलब्ध हैं, फिर क्यों नहीं उनमें अपनी
    क्षमता व प्रतिभा आजमायी जाये।

    स्कूल शिक्षा समाप्त हो जाने के बाद कैरियर की चिंता व उसका चुनाव की
    प्रक्रिया इतनी अव्यावहारिक ;पर आज भी प्रचलन मेंद्ध है कि अधिकांश
    छात्र-छात्राएं आगे चलकर अपने ही चयन पर तथा अपने ही कोर्स से घृणा करने
    लग जाते हैं। लेकिन तब तक देर इतनी हो चुकी होती है कि सिवाय पश्चाताप व
    सिर धुनने के और कोई चारा भी नहीं रह जाता। दूसरी ओर जो कैरियर का सही
    चुनाव ;यहां 'सही' से तात्पर्य योग्यता, क्षमता व अभिरूचि के अनुरूप
    हैंद्ध करने से असफल हो जाते हैं, वे भारत छोड़कर विदेशों में जाने की बात
    तो अपने आसपास फटकने भी नहीं देते। भारतीय शिक्षा को कोसने का काम भी
    उन्हीं का रह जाता है जो कैरियर के विवेकपूर्ण चुनाव में विफल रहते हैं।

    एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुझाव यह कि कैरियर के चुनाव का सही वक्त दसवीं
    कक्षा होनी चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा समय होता है जब छात्र-छात्राओं में
    सर्वाधिक अनिर्णय की स्थिति होती है पर साथ ही साथ उन्हें सबसे अधिक सही
    सुझाव और दिशा-निर्देश की भी आवश्यकता होती है। विषयों के चुनाव का यह
    सबसे सही वक्त होता है, पर्याप्त सोच-विचार कर अपनी रूचि के विषय का चयन
    उसमें कैरियर की संभावनाओं के मद्देनजर ही करना चाहिए। ऐसा नहीं कि
    आर्ट्स पढ़ने की इच्छा हो और साइंस में दाखिला लेने की मजबूरी, कॉमर्स में
    दिलचस्पी हो तथा इंजीनियरिंग कोर्स को अपनाने का दबाव, मेडिकल मे जाने की
    इच्छा हो, एम.बी.ए. मे दाखिला लेने की विवशता। इस तरह आधे-अधूरे मन से
    किये गये कैरियर के चुनाव में वांछित सफलता तो संदिग्ध रहती ही है,
    इच्छित नतीजे न मिलने से जीवन भर के लिए ही वह कोर्स अभिशाप बन जाता है।

    होना तो यह चाहिए कि आप जो भी कोर्स करने जा रहे हों, उसके बारे में अथवा
    उसकी संभावनाओं से आपको पूर्णतया वाकिफ होना चाहिए कि आखिर आप वह कोर्स
    किस लिये कर रहे हैं। कोर्स का अनायास चयन नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर
    न तो आप उस कोर्स के प्रति सीरियस हो सकेंगे और न ही अपने प्रति समुचित
    न्याय कर सकेंगे। आपको उक्त कोर्स में संतुष्टि भी नहीं मिलेगी, न
    पर्याप्त दिलचस्पी जगेगी और फिर नतीजा निराशा ही निराशा।

    छात्र-छात्राओं को हताशा अथवा निराशा का शिकार होने से बचाने के लिए
    कैरियर सलाह डॉट कॉम , कंचन मेडिकल स्टोर, आयुष्मान हॉस्पीटल, खन्दारी
    बाईपास, आगरा-202005 (उ.प्र.) (मोबाइल फोन नम्बर-9897267851) द्वारा
    सर्वप्रथम छात्र-छात्राओं से यह पता किया जाता है कि किस तरह के विषय में
    उनकी रूचि है, तदनुसार ही उक्त क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों से उसे वाकिफ
    कराया जाता है ताकि बगैर किसी दबाव के कैरियर के चयन की स्वतंत्रता में
    स्वविवेक के भी पर्याप्त इस्तेमाल का मौका उन्हें मिल सके। कभी-कभी तो
    ऐसा होता है कि मां-बाप अपने बेटे के आई.ए.एस. बनने का ख्वाब देखते है और
    उसी अनुसार उसकी शिक्षा पर भी बल देते है पर वह एक बिजनेंसमैन बनकर रह
    जाता है। कैरियर के चयन मे स्वतंत्रता न देने का ही यह नतीजा है कि
    उहापोह का शिकार छात्र कभी-कभार न घर का रह जाता है और न घाट का। कैरियर
    सलाह डॉट कॉम द्वारा छात्र-छात्राओं की अभिरूचि जान लेने पर उन्हें स्वयं
    'कैरियर प्लान' बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। ऐसा देखा गया है कि
    रूचि के किसी भी क्षेत्र विशेष में कैरियर बनाने की तमन्ना के विभिन्न
    रास्ते दिखा देने भर से ही छात्र-छात्राओं में उसे पूरा करने की इच्छा भी
    प्रबल होने लगती है। उनमें अनिर्णय जैसी स्थिति हर्गिज नहीं रहती तथा वे
    कैरियर विशेष के विभिन्न पहलुओं व विभिन्न रास्तों से परिचित होकर फैसला
    करने की स्थिति में होते हैं।

    फिर आज तो दर्जनो ऐसे व्यावसायिक कोर्स है जिनमे रोजगार की पूरी गारंटी
    तो है ही, सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्कूल से निकलने के साथ ही दाखिला भी
    संभव है। उदाहरण के लिए 10+2 के बाद कोई भी छात्र चाहे तो लॉ,
    मैनेजमेन्ट, डिजायन, होटल मैनेजमेन्ट तथा पत्रकारिता मे दाखिला ले सकता
    है। सिर्फ जानकारी होनी चाहिए कि वह शिक्षा कहां ग्रहण की जाये।

    कैरियर सलाह डॉट कॉम द्वारा छात्र-छात्राओं को शिक्षा व कैरियर में उनकी
    अभिरूचि के अनुसार यह जानकारी दी जाती है कि वे अपने देश में उपलब्ध
    अवसरों से किस तरह फायदा लेकर अपना भविष्य बना सकते हैं

    कैरियर के चुनाव मे उधेड़बुन की स्थिति नहीं होनी चाहिए। फैसला बिल्कुल
    अपने लक्ष्य को केन्द्र में लेकर होना चाहिए। यदि आई.ए.एस. बनना है तो
    अपको किस रूचि के विषय को अपना कर आसानी से कामयाबी हासिल की जा सकती है,
    इसका चयन भी सर्वप्रथम अत्यावश्यक है। मैनेजमेंट में जाना है तो वह भी
    स्पष्ट होना चाहिए कि होटल, बिजनेस अथवा पर्सनल मे। डॉक्टर बनने की
    तमन्ना हो या फैशन डिजाइनर बनने की चाह उसे पूरा कर पाने के लिए प्रयास
    भी बिल्कुल सही ढंग व गंभीरता से होने चाहिए।

    अपनी समस्या पत्राचार द्वारा लिखे या मेल करे।


    MB ...09897267851


    E-mail...sumanupkar@gmail.com
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  4. जॉब मार्केट में कॉम्पिटिशन काफी बढ रहा है। कंपनीज में डेली न जाने
    कितने ही क्वॉलिफाइड लोगों के सीवी पहुंचते हैं। जाहिर है, सीवी की इस
    भीड में आपकी सीवी स्पेशल न हो, तो बात बनते-बनते रह सकती है। क्योंकि
    रेज्यूमे ही है, जिसकी वजह से इस क्राउड में आप नोटिस हो पाते हैं। अब
    अगर आप भी ऐसी सीवी बनाना चाहते हैं, जिसे देखते ही एम्प्लॉयर इंप्रेस हो
    जाए, तो बताते हैं आपको कुछ खास टिप्स, जिन्हें फॉलो करके आप पा सकते हैं
    न्यू जॉब..

    बताएं क्वॉलिटीज

    कोई भी कंपनी जॉब देने से पहले देखती है कि वह आखिर आपको ले क्यों? इसके
    लिए सीवी में बताना होगा कि आपके पास उस पोस्ट के लिए क्वॉलिटी क्या है?
    अपनी क्वॉलिटी को पहले पहचानें, फिर दो या तीन सेंटेंस में उसे लिखें। आप
    कंपनी की ग्रोथ में किस तरह हेल्पफुल हो सकते हैं, इसे डिस्क्राइब करना
    भी जरूरी है। यहां इस बात का ध्यान रखें कि सीवी में वही लिखें जो आप कर
    सकते हैं। आपकी क्वॉलिफिकेशन खुद बता देगी कि आप क्या कर सकते हैं।

    अचीवमेंट्स करें हाईलाइट

    सीवी में सबसे पहले उन अचीवमेंट्स को शामिल करें, जो दूसरी कंपनी में जॉब
    के समय या स्टूडेंट लाइफ में हासिल कर चुके हैं। रेज्यूमे के पहले
    पैराग्राफ में इनकी डिटेल होगी, तो एचआर पर्सन की नजर सबसे पहले इसी पर
    पडेगी और इन्हें देखकर वह आपको इंटरव्यू या टेस्ट के लिए चूज कर लेगा।
    ध्यान रखें, अचीवमेंट्स को बहुत डिटेल में लिखने की जरूरत नहीं है।

    एक्सपीरियंस मैटर्स

    ज्यादातर कंपनियां जॉब के लिए उन्हीं को प्रॉयरिटी देती हैं, जिनके पास
    एक्सपीरियंस होता है। सीवी में अपने एक्सपीरियंस को एक सीरीज में लिखें।
    अगर पॉसिबल हो, तो जिन कंपनियों में वर्क किया है, उनके नाम के साथ उनकी
    डिवीजन का एड्रेस भी लिख दें। चाहें तो, इसमें अपने उस हेड का नाम भी
    शामिल कर सकते हैं, जिसके गाइडेंस में आपने वहां वर्क किया है।

    डिस्क्राइब पर्सनल प्रोजेक्ट

    अधिकतर सीवी लगभग एक जैसे ही होते हैं। इसमें चेंज कैसे किया जाए, यह एक
    बडा क्वैश्चन है। अगर आपने अपना कोई पर्सनल प्रोजेक्ट बनाया है, चाहे वह
    किसी भी फील्ड से रिलेटेड हो, तो उसे सीवी में जरूर मेंशन करें। एचआर
    डिपार्टमेंट को सीवी में नई चीज की तलाश रहती है। जिस प्रोजेक्ट को मेंशन
    किया है, उसके बारे में इंटरव्यू के दौरान निश्चित ही आपसे कुछ न कुछ
    जरूर पूछा जाएगा और अगर आपने अपने आंसर से इंटरव्यूवर को सेटिस्फाई कर
    दिया, तो समझिए जॉब पक्की।

    मेंशन करियर ग्रोथ

    सीवी में एक पैरा में अलग से वर्क एक्सपीरियंस के दौरान अपनी ग्रोथ को
    जरूर हाईलाइट करें। जब-जब आपको प्रमोशन मिला हो, आउट ऑफ टर्म इंक्रीमेंट
    मिला हो, तो उसके बारे में कुछ न कुछ एक-दो लाइन में जरूर लिखें। इन
    चीजों से पता चलता है कि वर्क को लेकर आप कितने सिंसियर रहते हैं।
    कंपनियां लोगों को प्रमोशन उनके क्वॉलिटी वर्क के बेस पर ही देती हैं।
    इसका बेनिफिट नई कंपनी में भी आपको मिलेगा। सीवी में इन चीजों का ध्यान
    रखेंगे, तो जॉब मार्केट में जॉब के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी
    पडेगी।

    एक्सपर्ट ओपिनियन

    रिज्यूमे में सबसे इंपॉर्टेट प्रोफेशनल एक्सपीरियंस और एजुकेशन होती है।
    इन्हें सबसे पहले हाईलाइट करें। सीवी पूरी तरह प्रोफेशनल लैंग्वेज में हो
    और उसमें किसी भी तरह की एरर नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह एक मार्केटिंग
    टूल है। अगर आपने लाइफ में कुछ खास अचीवमेंट्स हासिल किए हैं, तो उन्हें
    सीवी में हाईलाइट करना कभी न भूलें।

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  5. पढो, पढाओ और भविष्य बनाओ

    मातापिता की जिम्मेदारी सिर्फ अच्छे स्कूल/कॉलेज में दाखिला कराने,
    किताबें ला देने और सख्ती करने तथा टयूटर लगाने तक ही सीमित नहीं रह जाती
    है। बच्चा पढाई में मन लगाए, उसमें एन्जौय ले और कुछ सीखे, इसके लिए
    जरूरी है कि उसे वैसा माहौल मिले। यह आपकी जिम्मेदारी है।

    योजनाबद्ध तरीके से वक्त बचाएं। गैरजरूरी चीजों पर लगाम लगाएं। आलस्य
    छोडें। यह टाइम बच्चो और उसकी पढाई पर ध्यान दें।

    बच्चो की खूबियों प्रोत्साहित करें। किसी और बच्चो से उसकी तुलना बिल्कुल
    ना करें, उसे समझाएं कि सारे विषयों का महत्व है। उसे जिज्ञासु बनाने का
    प्रयास करें।

    जब आप की बाकी चीजों के लिए टाइम मैनेजमेंट कर सकते हैं, तो निश्चित ही
    अपने बच्चो की पढाई के लिए भी वक्त निकाल सकेंगे।

    जितने मनोयोग से बच्चो केलिए डिजाइनर कपडे लाते हैं, उतना ही मन लगाकर
    उसे कलए सहायक सामग्रियां चुनें। विज्ञान, गणित, इतिहास आदि विषयों से
    जुडी दिलचस्प किताबें मार्केट में मौजूद हैं। बच्चो के लिए चित्रों,
    गीतों और पहेलियौं वाली किताबें पढना खेल की तहर होता है।

    बच्चो की जिज्ञासा को कभी भी टालें नहीं। यदि जवाब नहीं मालूम, तो उससे
    कहें कि आप एक निश्चित समय बाद उसे विस्तार से समझाएंगे। इस बीच किताब या
    इंटरनेट आदि स्त्रोंतो से जवाब पता करें और अपना वादा पूरा कर दें।

    बच्चो की किताबें एक बार पलटकर तो देखें। बहुत कुछ आपका पढा हुआ है। उसे
    याद करें। जो नई चीज है, उसे पढें, समझें, संदर्भ खोजें। इसमें आपको आनंद
    आएगा और आपकी जानकारी भी दुरूस्त होगी।


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  6. बचपन से ही हम यही सुनते आ रहे थे कि एक वक्त में एक ही काम करो, एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए..दो नावों की सवारी में डूबने का खतरा रहता है..। शायद हमारे बुजुर्गो की इन बातों के पीछे यही सोच काम कर रही होगी कि किसी भी काम के अच्छे परिणाम के लिए एकाग्रता की जरूरत होती है। फिर वक्त के साथ जीवनशैली व्यस्त से व्यस्ततम होने लगी। सीमित समय और संसाधनों में बेहतर परिणाम हासिल करने के नए-नए तरीके ढूंढे जाने लगे।
    क्या है मल्टीटास्किंग
    दरअसल मल्टीटास्किंग शब्द कंप्यूटर इंजीनियररिंग के क्षेत्र से लिया गया है। 90 के दशक तक कंप्यूटर हमारी जीवनशैली का जरूरी हिस्सा बन चुका था। इसके बाद सॉफ्टवेयर विशेषज्ञों ने यह सोचना शुरू किया कि अगर कंप्यूटर का माइक्रो प्रोसेसर एक ही वक्त में कई अलग-अलग तरह के कार्य करता है तो मानव मस्तिष्क ऐसा क्यों नहीं कर सकता? यही वह दौर था, जब पूरी दुनिया में मल्टीटास्किंग स्किल पर बहस छिड गई। मैनेजमेंट से जुडे कुछ लोगों का ऐसा मानना था कि इससे हमारे दिमाग की सक्रियता बढ जाएगी और कम समय में ज्यादा काम निबटाना संभव होगा, पर कुछ लोग इसके पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि शुरुआत में भले ही इसके अच्छे परिणाम हासिल हों, लेकिन एक समय के बाद इसके कई नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेंगे।
     
    वक्त की जरूरत
    आज मल्टीटास्किंग वक्त की जरूरत बनती जा रही है क्योंकि कडी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर इंसान दूसरे से आगे निकलना चाहता है। प्रोफेशनल लाइफ में आगे बढने के लिए लोग यही चाहते हैं कि वे एक साथ ज्यादा से ज्यादा कार्यो को बेहतर ढंग से पूरा कर सकें। आपने नोटिस किया होगा कि एंटरटेनमेंट सेक्टर में कितना जबरदस्त बदलाव आया है। पहले फिल्मों के प्लेबैक सिंगर केवल गाना जानते थे, पर स्टेज परफॉर्मेस के दौरान आज के प्राय: सभी सिंगर्स गाने के साथ डांस भी सीख गए हैं। बात सिर्फ इतनी है कि चाहे सिंगर हो या इंजीनियर, हर इंसान को अपने मूल कार्य की प्रकृति से जुडे अन्य कार्यो को भी सीखने-समझने की कोशिश करनी चाहिए। यह उसकी प्रोफेशनल लाइफ के लिए बहुत फायदेमंद साबित होता है।
    जरूरी है निश्चित सीमा रेखा
    हाल ही में कुछ अमेरिकी कंपनियों द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि वहां काम कर रहे भारतीय मल्टीटास्किंग कार्यशैली अपनाने में सबसे आगे हैं। इसके अलावा सर्वेक्षणों से यह बात भी सामने आई है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक तत्परता से मल्टीटास्किंग कार्यशैली अपनाती हैं, क्योंकि घरेलू कार्यो के अनुभवों से उन्हें इस बात का सही अंदाजा होता है कि कम समय में कई कार्यो को अच्छी तरह कैसे निबटाया जा सकता है। समय और ऊर्जा की बचत के लिए एक ही वक्त में कई काम करने में कोई बुराई नहीं है, पर ऐसा करते समय आपको कार्य की प्रकृति और गंभीरता पर जरूर विचार करना चाहिए। मिसाल के तौर पर अगर कंप्यूटर पर कोई बडी फाइल खुलने में ज्यादा वक्त लेती है तो इस बीच आप अपना जरूरी फोन कॉल निबटा लें। इससे समय की बचत होगी और एक साथ दो काम आसानी से पूरे हो जाएंगे, पर ऐसा करने से पहले आपको कार्य की प्रकृति को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। अगर आप बैंक के कैश काउंटर पर बैठते हैं तो कैश संभालने के अलावा किसी दूसरे काम के बारे में सोचना भी आपके लिए बहुत भारी पड सकता है।
    टाइम और स्किल मैनेजमेंट
    मल्टीटास्किंग कार्यशैली को ज्यादा फायदेमंद बनाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरत है-समय और प्रोफेशनल स्किल्स को सही ढंग से मैनेज करने की। अगर वक्त की कीमत पहचानते हुए दिन के एक-एक मिनट का सही इस्तेमाल किया जाए तो इससे एक वक्त में कई कार्यो को कुशलता से निबटाया जा सकता है। इसके लिए पूरे दिन की दिनचर्या में घंटों के हिसाब से अपने कार्यो की डेडलाइन तय करें। हो सकता है कि शुरुआत में आप निर्धारित समय सीमा के भीतर काम पूरा न कर पाएं, पर कुछ दिनों के अभ्यास से ही आपको खुद-ब-खुद फर्क नजर आएगा। आपको इस बात का सही अंदाजा होना चाहिए कि किसी एक कार्य में कितना समय खर्च होगा। फिर उसी हिसाब से दो कार्यो के बीच के खाली समय का इस्तेमाल छोटे कार्यो के लिए कर सकते हैं।
     
    न खोएं अपनी पहचान
    चाहे क्रिकेट का मैदान हो या आपका कार्यस्थल, ऑलराउंडर होना अच्छी बात है, पर अगर आप अच्छे बल्लेबाज हैं तो चाहे कितनी ही अच्छी फील्डिंग क्यों न करते हों, आपको अपनी बैटिंग सुधारने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए। अति उत्साह में आकर आप अपनी प्राथमिकताएं न भूलें। जो कार्य सबसे जरूरी हो उस पर पहले ध्यान दें और उसे पूरा करने के बाद ही कोई नया काम शुरू करें। अगर बीच में कोई नया काम करना भी पडे तो उसे पूरा करके तुरंत अपने मुख्य काम में जुट जाएं। 

    अंग्रेजी में एक कहावत है- जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स, मास्टर ऑफ नन अर्थात कुछ लोग सभी कार्यो के बारे में थोडा-थोडा जरूर जानते हैं, लेकिन किसी भी एक काम में उनकी विशेषज्ञता नहीं होती। मल्टीटास्किंग कार्यशैली में भी इसी बात का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इसलिए आप अपने फील्ड से संबंधित नए प्रोफेशनल स्किल्स जरूर सीखें पर किसी एक कार्य में ऐसी दक्षता हासिल करने की कोशिश करें, जो आपकी खास पहचान बन जाए।
    मल्टीटास्किंग कार्यशैली की खूबियों और खामियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कार्य की प्रकृति और गंभीरता को समझते हुए अगर इसे संतुलित ढंग से अपनाया जाए तो इसका अधिकतम लाभ हासिल किया जा सकता है।
    मल्टीटास्किंग कार्यशैली
    पायदे 1. कम समय में ज्यादा कार्य होता है।
    2. कार्यक्षमता बढती है।
    3. समय और संसाधनों की बचत होती है और उनका इस्तेमाल दूसरे उत्पादक कार्यो के लिए किया जा सकता है।
    4. कम समय में लक्ष्य हासिल करने से कार्य करने वाले व्यक्ति के मन में उत्साह का संचार होता है और उसका आत्मविश्वास भी बढता है।
    5. इसे अपनाने से प्रोफेशनल स्किल्स में इजाफा होता है।
    नुकसान
    1. शुरुआती दौर में मल्टीटास्किंग कार्यशैली के फायदे जरूर नजर आते हैं, पर इसे लंबे समय तक अपनाने के बाद रिजल्ट की क्वॉलिटी और कार्यक्षमता में गिरावट आने लगती है। 


    2. जब किसी को मल्टीटास्टिंग कार्यशैली की आदत पड जाती है तो वह अनजाने में इसका इस्तेमाल अनुत्पादक और व्यक्तिगत कार्यो के लिए भी करने लगता है। मसलन कंप्यूटर पर काम करते हुए चैंटिंग और फोन पर बातें करना आदि।

    3. इसे अपनाने वाले लोगों की एकाग्रता में कमी आती है और नतीजतन वे एक साथ कई कार्यो को तो निबटा सकते हैं, पर उनकी कार्यशैली से परफेक्शन खत्म होने लगता है।

    4. अब तक किए गए किए अनुसंधानों से यह तथ्य सामने आया है कि मल्टीटास्किंग होने की वजह से आजकल लोगों में शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस की समस्या बहुत ज्यादा देखने को मिल रही है।

    5. मल्टीटास्किंग कार्यशैली अपनाने वाले लोगों की ऐसी आदत बन जाती है कि वे केवल प्रोफेशनल ही नहीं, बल्कि पर्सनल लाइफ में भी इसे अपनाने लग जाते हैं। मसलन, ब"ो को पढाते समय मोबाइल पर बातें करना, टीवी देखते हुए खाना आदि। नतीजतन स्वास्थ्य और रिश्तों पर भी इसका नकारात्मक असर दिखाई देने लगता है।

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