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  1. यह कहानी बहुत पुरानी है. किसी नगर के समीप एक पहाड़ी पर तीन वृक्ष थे. वे तीनों अपने सुख-दुःख और सपनों के बारे में एक दूसरे से बातें किया करते थे.
    एक दिन पहले वृक्ष ने कहा – “मैं खजाना रखने वाला बड़ा सा बक्सा बनना चाहता हूँ. मेरे भीतर हीरे-जवाहरात और दुनिया की सबसे कीमती निधियां भरी जाएँ. मुझे बड़े हुनर और परिश्रम से सजाया जाय, नक्काशीदार बेल-बूटे बनाए जाएँ, सारी दुनिया मेरी खूबसूरती को निहारे, ऐसा मेरा सपना है.”
    दूसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो एक विराट जलयान बनना चाहता हूँ. बड़े-बड़े राजा और रानी मुझपर सवार हों और दूर देश की यात्राएं करें. मैं अथाह समंदर की जलराशि में हिलोरें लूं. मेरे भीतर सभी सुरक्षित महसूस करें और सबका यकीन मेरी शक्ति में हो… मैं यही चाहता हूँ.”
    अंत में तीसरे वृक्ष ने कहा – “मैं तो इस जंगल का सबसे बड़ा और ऊंचा वृक्ष ही बनना चाहता हूँ. लोग दूर से ही मुझे देखकर पहचान लें, वे मुझे देखकर ईश्वर का स्मरण करें, और मेरी शाखाएँ स्वर्ग तक पहुंचें… मैं संसार का सर्वश्रेष्ठ वृक्ष ही बनना चाहता हूँ.”
    ऐसे ही सपने देखते-देखते कुछ साल गुज़र गए. एक दिन उस जंगल में कुछ लकड़हारे आए. उनमें से जब एक ने पहले वृक्ष को देखा तो अपने साथियों से कहा – “ये जबरदस्त वृक्ष देखो! इसे बढ़ई को बेचने पर बहुत पैसे मिलेंगे.” – और उसने पहले वृक्ष को काट दिया. वृक्ष तो खुश था, उसे यकीन था कि बढ़ई उससे खजाने का बक्सा बनाएगा.
    दूसरे वृक्ष के बारे में लकड़हारे ने कहा – “यह वृक्ष भी लंबा और मजबूत है. मैं इसे जहाज बनाने वालों को बेचूंगा”. दूसरा वृक्ष भी खुश था, उसका चाहा भी पूरा होने वाला था.
    लकड़हारे जब तीसरे वृक्ष के पास आए तो वह भयभीत हो गया. वह जानता था कि अगर उसे काट दिया गया तो उसका सपना पूरा नहीं हो पाएगा. एक लकड़हारा बोला – “इस वृक्ष से मुझे कोई खास चीज नहीं बनानी है इसलिए इसे मैं ले लेता हूं”. और उसने तीसरे वृक्ष को काट दिया.
    पहले वृक्ष को एक बढ़ई ने खरीद लिया और उससे पशुओं को चारा खिलानेवाला कठौता बनाया. कठौते को एक पशुगृह में रखकर उसमें भूसा भर दिया गया. बेचारे वृक्ष ने तो इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी. दूसरे वृक्ष को काटकर उससे मछली पकड़नेवाली छोटी नौका बना दी गई. भव्य जलयान बनकर राजा-महाराजाओं को लाने-लेजाने का उसका सपना भी चूर-चूर हो गया. तीसरे वृक्ष को लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लिया गया और टुकड़ों को अंधेरी कोठरी में रखकर लोग भूल गए.
    एक दिन उस पशुशाला में एक आदमी अपनी पत्नी के साथ आया. स्त्री ने वहां एक बच्चे को जन्म दिया. वे बच्चे को चारा खिलानेवाले कठौते में सुलाने लगे. कठौता अब पालने के काम आने लगा. पहले वृक्ष ने स्वयं को धन्य माना कि अब वह संसार की सबसे मूल्यवान निधि अर्थात एक शिशु को आसरा दे रहा था.
    समय बीतता गया. सालों बाद कुछ नवयुवक दूसरे वृक्ष से बनाई गई नौका में बैठकर मछली पकड़ने के लिए गए. उसी समय बड़े जोरों का तूफान उठा और नौका तथा उसमें बैठे युवकों को लगा कि अब कोई भी जीवित नहीं बचेगा. एक युवक नौका में निश्चिंत सा सो रहा था. उसके साथियों ने उसे जगाया और तूफान के बारे में बताया. वह युवक उठा और उसने नौका में खड़े होकर उफनते समुद्र और झंझावाती हवाओं से कहा – “शांत हो जाओ”. और तूफान थम गया. यह देखकर दूसरे वृक्ष को लगा कि उसने दुनिया के परम ऐश्वर्यशाली सम्राट को सागर पार कराया है.
    तीसरे वृक्ष के पास भी एक दिन कुछ लोग आए. उन्होंने उसके दो टुकड़ों को जोड़कर एक घायल आदमी के ऊपर लाद दिया. ठोकर खाते, गिरते-पड़ते उस आदमी का सड़क पर तमाशा देखती भीड़ अपमान करती रही. वे जब रुके तब सैनिकों ने लकड़ी के सलीब पर उस आदमी के हाथों-पैरों में कीलें ठोंककर उसे पहाड़ी की चोटी पर खड़ा कर दिया. दो दिनों के बाद रविवार को तीसरे वृक्ष को इसका बोध हुआ कि उस पहाड़ी पर वह स्वर्ग और ईश्वर के सबसे समीप पहुंच गया था क्योंकि ईसा मसीह को उसपर सूली पर चढ़ाया गया था.
    सब कुछ अच्छा करने के बाद भी जब हमारे काम बिगड़ते जा रहे हों तब हमें यह समझना चाहिए कि शायद ईश्वर ने हमारे लिए कुछ बेहतर सोचा है. यदि आप उसपर यकीन बरक़रार रखेंगे तो वह आपको नियामतों से नवाजेगा. प्रत्येक वृक्ष को वह मिल गया जिसकी उसने ख्वाहिश की थी, लेकिन उस रूप में नहीं मिला जैसा वे चाहते थे. हम नहीं जानते कि ईश्वर ने हमारे लिए क्या सोचा है या ईश्वर का मार्ग हमारा मार्ग है या नहीं… लेकिन उसका मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है.

  2. बांग्लादेश में बनाया गया यह कूलर इन दिनों गर्मी की मार झेल रहे भारत के लिए भी काफी उपयोगी साबित हो सकता है


    देश में इन दिनों सूरज आग बरसा रहा है. कई हिस्सों में पारा 45-46 डिग्री तक पहुंच गया है. एक बड़ी आबादी है जिसके पास इस झुलसाती गर्मी से राहत पाने का कोई उपाय नहीं क्योंकि उसके पास पंखा या कूलर नहीं है. अगर है भी तो जहां यह आबादी रहती है उन इलाकों में बिजली या तो नहीं है या फिर उसका कोई भरोसा नहीं है.
    लेकिन पडो़सी बांग्लादेश से निकला एक उपाय इस मुश्किल को आसान कर सकता है. यह उपाय है घर को ठंडा करने के लिए बनाया गया एक कूलर. इस सस्ते और उपयोगी कूलर की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए न तो बिजली की जरूरत है और न पानी की.
    बांग्लादेश की तरह भारत के ग्रामीण इलाकों में भी कई लोग टिन की छत वाले घरों में रहते हैं. दुपहरी में तपती ये छतें गरमी में घर को किसी भट्टी की तरह गर्म कर देती हैं. इको कूलर ऐसे घरों में तापमान को सामान्य कर सकता है.

    इको कूलर और कुछ नहीं एक ग्रिडनुमा व्यवस्था है जो आधी कटी हुई प्लास्टिक की बोतलों से बनता है. इस ग्रिड को खिड़की पर फिट कर दिया जाता है. बोतल के चौड़े हिस्से से घुसने वाली गर्म हवा जब इसके संकरे हिस्से में पहुंचती है तो ‘कंप्रेस’ हो जाती है और फिर यह दूसरे छोर से बाहर निकलती है तो थर्मोडायनेमिक्स के नियमों के मुताबिक थोड़ी ठंडी हो जाती है. यही ठंडी हवा कमरे में दाखिल होकर राहत पहुंचाने का काम करती है. बताया जा रहा है कि इससे तापमान पांच डिग्री तक घट जाता है.

    यह जुगत एडवरटाइजिंग एजेंसी ग्रे बांग्लादेश और ढाका स्थित एक तकनीकी कंपनी ग्रामीण इंटेल सोशल बिजनेस ने विकसित की है. इसके बनने में जो सामग्री लगती है वह आसानी से मिल जाती है जिसके चलते इको कूलर गर्मी में राहत पहुंचाने का एक सस्ता और बढ़िया विकल्प साबित हो रहा है.

  3. कहानी है यह हिन्दुस्तान की।बहुत समय पहले की बात है एक भिश्ती था। उसके
    पास दो घडे थे। उन घडों को उसने एक लम्बे डंडे के दो किनारों से बांधा
    हुआ था।एक घडा था साबुत और सुन्दर परन्तु दूसरे घडे में दरार थी।

    भिश्ती हर सुबह नदी तट पर जा कर दोनों घडों में पानी भरता और फिर शुरू
    होता उसका लम्बा सफर ऊंची पहाडी चढ क़र मालिक के घर तक । जब तक वह वहां
    पहुंचता टूटे हुए घडे में से आधा पानी रास्ते में ही बह चुका होता जबकि
    साबुत घडे में पूरा पानी होता।

    बहुत समय तक ऐसे ही चलता रहा । मालिक के घर तक डेढ घडा पानी ही पहुंचता
    था।साबुत घडे क़ो अपने पर बहुत घमंड था। उसकी बनावट बहुत सुन्दर थी और वह
    काम में भी पूरा आता था । टूटे हुए घडे क़ो अपनी बेबसी पर आंसू आते । वह
    उदास और दुखी रहता क्योंकि वह अधूरा था। उसे अपनी कमी का एहसास था। वह
    जानता था कि जितना काम उसे करना चाहिये वह उससे आधा ही कर पाता है।

    एक दिन टूटा हुआ घडा अपनी नाकामयाबी को और सहन नहीं कर पाया और वह भिश्ती
    से बोला ''मुझे अपने पर शर्म आती है मै अधूरा हूं। मैं आपसे क्षमा
    मांगना चाहता हूं।'' भिश्ती ने उससे पूछा ''तुम्हें किस बात की शर्म
    है।'' ''आप इतनी मेहनत से पानी लाते है और मै उसे पूरा नहीं रोक पाता
    आधा रास्ते में ही गिर जाता है । मेरी कमी के कारण मालिक को आप पूरा पानी
    नहीं दे पाते'' दरार वाला घडा बोला।

    भिश्ती को टूटे हुए घडे पर बहुत तरस आया। उसके हृदय में दया और करूणा थी।
    उसने प्यार से टूटे हुए घडे से कहा ''आज जब हम पानी लेकर वापस आयेंगे तब
    तुम रास्ते में खुबसूरत फूलों को ध्यान से देखना। चढते सूरज की रोशनी में
    यह फूल कितने अच्छे लगते है।''और उस दिन टूटे हुए घडे ने देखा कि सारे
    रास्ते के किनारे बहुत ही सुन्दर रंगबिरंगे फूल खिले हुए थे।

    उन लाल नीले पीले फूलों को देख कर उसका दुखी मन कुछ समय के लिये अपना दुख
    भूल गया। परन्तु मालिक के घर पहुंचते ही वह फिर उदास हो गया। उसे बुरा
    लगा कि फिर इतना पानी टपक गया था।नम्रतापूर्वक टूटे हुए घडे ने फिर
    भिश्ती से माफी मांगी।

    तब वह भिश्ती टूटे हुए घडे से बोला ''क्या तुमने ध्यान दिया कि रास्ते
    में वह सुन्दर फूल केवल तुम्हारी तरफ वाले रास्ते पर ही खिले हुए थे। मैं
    तुम्हारी इस कमजोरी के बारे में जानता था और मैने इसका फायदा उठाया। मैने
    फूलों के बीज केवल तुम्हारी तरफ ही बोये थे और हर सुबह जब हम इस रास्ते
    से गुजरते तो तुम इन पौधों को पानी देते थे। पिछले दो सालों से यही फूल
    मालिक के घर की शोभा बढाते हैं। तुम जैसे भी हो बहुत काम के हो अगर तुम न
    होते तो मालिक का घर इन सुन्दर फूलों से सुसज्जित न होता।''

    ईश्वर ने हम सब में कुछ कमियां दी है। हम सब उस टूटे अधूरे घडे ज़ैसे हैं
    पर हम चाहें तो हम इन कमजोरियों पर काबू पा सकते हैं।हमें कभी भी अपनी
    कमियों से घबराना नहीं चाहिये हमें एहसास होना चाहिये कि हममें क्या
    कमियां हैं और फिर उन कमजोरियों के बावाजूद हम अपने चारों तरफ खूबसूरती
    फैला सकते हैं खुशियां बांट सकते हैं। अपनी कमी में ही अपनी मजबूती ढूंढ
    सकते हैं।

  4. 1. वस्तुए तुम्हे छोड़ दे तो मौत है और तुम वस्तुओ को छोड़ दो तो मोक्ष है.

    2. जो बार बार आये वो मौत है और जो एक बार आये वो मोक्ष.

    3. मौत भोगी को आती है और मोक्ष योगी को होता है.

    4. भोगी को मौत छोड़ती नही है और योगी को मौत छेड़ती नही है.

    5. पुराने वस्त्र (शरीर) उतार कर नए वस्त्र धारण करना मौत है और पुराने
    वस्त्र उतार फेंकना और फिर नए वस्त्र धारण न करना मोक्ष है.

    6. मौत को मौत आ जाना ही मोक्ष है.

  5. सायंकाल का समय था | सभी पक्षी अपने अपने घोसले में जा रहे थे | तभी गाव
    कि चार ओरते कुए पर पानी भरने आई और अपना अपना मटका भरकर बतयाने बैठ गई |

    इस पर पहली ओरत बोली अरे ! भगवान मेरे जैसा लड़का सबको दे |उसका कंठ इतना
    सुरीला हें कि सब उसकी आवाज सुनकर मुग्ध हो जाते हें |

    इसपर दूसरी ओरत बोली कि मेरा लड़का इतना बलवान हें कि सब उसे आज के युग
    का भीम कहते हें |
    इस पर तीसरी ओरत कहाँ चुप रहती वह बोली अरे ! मेरा लड़का एक बार जो पढ़
    लेता हें वह उसको उसी समय कंठस्थ हो जाता हें |

    यह सब बात सुनकर चोथी ओरत कुछ नहीं बोली तो इतने में दूसरी ओरत ने कहा "
    अरे ! बहन आपका भी तो एक लड़का हें ना आप उसके बारे में कुछ नहीं बोलना
    चाहती हो" |

    इस पर से उसने कहाँ मै क्या कहू वह ना तो बलवान हें और ना ही अच्छा गाता हें |
    यह सुनकर चारो स्त्रियों ने मटके उठाए और अपने गाव कि और चल दी |

    तभी कानो में कुछ सुरीला सा स्वर सुनाई दिया | पहली स्त्री ने कहाँ "देखा
    ! मेरा पुत्र आ रहा हें | वह कितना सुरीला गान गा रहा हें |" पर उसने
    अपनी माँ को नही देखा और उनके सामने से निकल गया |

    अब दूर जाने पर एक बलवान लड़का वहाँ से गुजरा उस पर दूसरी ओरत ने कहाँ |
    "देखो ! मेरा बलिष्ट पुत्र आ रहा हें |" पर उसने भी अपनी माँ को नही देखा
    और सामने से निकल गया |

    तभी दूर जाकर मंत्रो कि ध्वनि उनके कानो में पड़ी तभी तीसरी ओरत ने कहाँ
    "देखो ! मेरा बुद्धिमान पुत्र आ रहा हें |" पर वह भी श्लोक कहते हुए वहाँ
    से उन दोनों कि भाति निकल गया |

    तभी वहाँ से एक और लड़का निकला वह उस चोथी स्त्री का पूत्र था | वह अपनी
    माता के पास आया और माता के सर पर से पानी का घड़ा ले लिया और गाव कि और
    गाव कि और निकल पढ़ा |

    यह देख तीनों स्त्रीयां चकित रह गई | मानो उनको साप सुंघ गया हो | वे
    तीनों उसको आश्चर्य से देखने लगी तभी वहाँ पर बैठी एक वृद्ध महिला ने
    कहाँ "देखो इसको कहते हें सच्चा हीरा "

    " सबसे पहला और सबसे बड़ा ज्ञान संस्कार का होता हें जो किसे और से नहीं
    बल्कि स्वयं हमारे माता-पिता से प्राप्त होता हें | फिर भले ही हमारे
    माता-पिता शिक्षित हो या ना हो यह ज्ञान उनके अलावा दुनिया का कोई भी
    व्यक्ति नहीं दे सकता हें

  6. बहुत समय पहले की बात है ,एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे
    भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने
    शानदार बाज नहीं देखे थे।राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को
    नियुक्त कर दिया।

    जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह
    पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था।

    राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार
    लग रहे थे ।
    राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, " मैं इनकी उड़ान देखना
    चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो । "

    आदमी ने ऐसा ही किया।
    इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे ,पर जहाँ एक बाज आसमान की
    ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर
    बैठ गया जिससे वो उड़ा था।
    ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा. "क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी
    उड़ान भर रहा है, वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?", राजा ने
    सवाल किया।

    " जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।"
    राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना
    देखना चाहते थे।
    अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा
    उड़ाने में कामयाब होगा, उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।

    फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे
    , पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और
    वापस डाल पर आकर बैठ जाता।

    फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़
    रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस
    व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था।
    वह व्यक्ति एक किसान था। अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में
    स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा , " मैं तुमसे बहुत
    प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये
    वो तुमने कैसे कर दिखाया।"

    "मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें
    नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदि हो चुका
    था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा। "

    दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे
    होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा
    करने की काबिलियत को भूल जाते हैं।

    यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं ... जो आपके सही क्षमता
    के मुताबिक नहीं है तो ,..... एक बार ज़रूर सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल
    को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हुए हैं ?

  7. index post

    Friday, June 20, 2014

    कुछ क्षण प्रतीक्षा कीजिए...


  8. बिच्छू

    Saturday, June 14, 2014

    बिच्छू आर्थ्रोपोडा (Arthropoda) संघ का साँस लेनेवाला ऐरैक्निड (मकड़ी)
    है। इसकी अनेक जातियाँ हैं, जिनमें आपसी अंतर बहुत मामूली हैं। यहाँ बूथस
    (Buthus) वंश का विवरण दिया जा रहा है, जो लगभग सभी जातियों पर घटता है।

    यह साधारणतः उष्ण प्रदेशों में पत्थर आदि के नीचे छिपे पाये जाते हैं और
    रात्रि में बाहर निकलते हैं। बिच्छू की लगभग 2,000 जातियाँ होती हैं जो
    न्यूजीलैंड तथा अंटार्कटिक को छोड़कर विश्व के सभी भागों में पाई जाती
    हैं। इसका शरीर लंबा चपटा और दो भागों- शिरोवक्ष और उदर में बटा होता है।
    शिरोवक्ष में चार जोड़े पैर और अन्य उपांग जुड़े रहते हैं। सबसे नीचे के
    खंड से डंक जुड़ा रहता है जो विष-ग्रंथि से संबद्ध रहता है। शरीर काइटिन
    के बाह्यकंकाल से ढका रहता है। इसके सिर के ऊपर दो आँखें होती हैं। इसके
    दो से पाँच जोड़ी आँखे सिर के सामने के किनारों में पायी जाती हैं।

    बिच्छू साधारणतः उन क्षेत्रों में रहना पसन्द करते हैं जहां का तापमान
    200 से 350 सेंटीग्रेड के बीच रहता हैं। परन्तु ये जमा देने वाले शीत तथा
    मरूभूमि की गरमी को भी सहन कर सकते हैं।

    अधिकांश बिच्छू इंसान के लिए हानिकारक नहीं हैं। वैसे, बिच्छू का डंक
    बेहद पीड़ादायक होता है और इसके लिए इलाज की जरूरत पड़ती है। शोधकर्ताओं
    के मुताबिक बिच्छू के जहर में पाए जाने वाले रसायन क्लोरोटोक्सिन को अगर
    टयूमर वाली जगह पर लगाया जाए तो इससे स्वस्थ और कैंसरग्रस्त कोशिकाओं की
    पहचान आसानी से की जा सकती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि क्लोरोटोक्सिन
    कैंसरग्रस्त कोशिकाओं पर सकारात्मक असर डालता है। यह कई तरह के कैंसर के
    इलाज में कारगर साबित हो सकता है। उनका मानना है कि बिच्छू का जहर कैंसर
    का ऑपरेशन करने वाले सर्जनों के लिए मददगार साबित हो सकता है। उन्हें
    कैंसरग्रस्त और स्वस्थ कोशिकाओं की पहचान करने में आसानी होगी।

    बिच्छू का शरीर

    बिच्छू का शरीर लंबा, संकरा और परिवर्ती रंगों का होता है। शरीर दो भागों
    का बना होता है, एक छोटा अग्र भाग शिरोवक्ष या अग्रकाय (cephalothorax,
    prosoma) और दूसरा लंबा पश्चभाग, उदर (abdomen, opisthosoma) है।
    शिरोवक्ष एक पृष्ठवर्म (carapace) से पृष्ठत: आच्छादित रहता है, जिसके
    लगभग मध्य में एक जोड़ा बड़ी आँखें और उसके अग्र पार्श्विक क्षेत्र में
    अनेक जोड़ा छोटी आँखें होती हैं। उदर का अगला चौड़ा भाग मध्यकाय
    (Mesosoma) सात खंडों का बना होता है। प्रत्येक खंड ऊपर पृष्ठक (tergum)
    से और नीचे उरोस्थि (sternum) से आवृत होता है। ये दोनों पार्श्वत: एक
    दूसरे से कोमल त्वचा द्वारा जुड़े होते हैं।

    पश्चकाय (metasoma) उदर का पश्च, सँकरा भाग है जिसमें पाँच खंड होते हैं।
    जीवित प्राणियों में पश्चकाय का अंतिम भाग, जो पुच्छ है, स्वभावत: पीठ पर
    मुड़ा होता है। इसके अंतिम खंड से अंतस्थ उपांग (appendage) संधिबद्ध
    (articulated) होता है और पुच्छीय मेरुदंड (caudal spine) आधार पर फूला
    और शीर्ष पर, जहाँ विषग्रंथियों की वाहिनियाँ खुलती हैं, नुकीला होता है।
    अंतिम खंड के अधर पृष्ठ (ventral surface) पर डंक के ठीक सामने गुदा
    द्वार स्थित होता है। मुख एक छोटा सा छिद्र है, जो अग्रकाय के अगले सिरे
    पर अधरत: स्थिर होता है। मुख पर लैब्रम (labrum) छाया रहता है।

    --
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  9. [जन्म 5 जून 1723 (रूस) – निधन 17 जुलाई 1790 (न्यूयॉर्क)]

    'द वेल्थ ऑफ नेशंस' के साथ एडम स्मिथ ने खुद को समकालीन आर्थिक सोच के
    प्रमुख के तौर पर स्थापित कर लिया था। एडम स्मिथ की सोच की यही ऊर्जा
    19वीं सदी में डेविड रिकार्डो और कार्ल मार्क्स और फिर 20वीं सदी में
    कीन्स और फ्रीडमैन तक देखने को मिली।

    स्मिथ का जन्म स्कॉटलैंड के एक छोटे से गांव कर्क हैडली में हुआ था। 14
    वर्ष की उम्र में स्कॉलरशिप (जैसा कि उन दिनों प्रचलन में था) पर
    यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में दाखिले से पहले तक उनकी देखभाल विधवा मां ने
    की। बाद में उन्होंने ऑक्सफोर्ड के बेलियल कॉलेज में दाखिला ले लिया। जब
    वे स्नातक हुए तो उनके पास यूरोपियन साहित्य का अच्छा खासा ज्ञान था और
    और साथ ही था अंग्रेजी स्कूलों के लिए एक स्थायी तिरस्कार भाव। वे घर
    लौटे और कई पसंद किए गए लेक्चरों की सीरीज के बाद उन्होंने ग्लास्गो
    यूनिवर्सिटी में 1751 में 'फर्स्ट चेयर ऑफ लॉजिक' और फिर अगले साल (1752)
    में 'चेयर ऑफ मॉरल फिलासॉफी' की स्थापना की। 1764 में शिक्षा जगत छोड़कर
    वो यंग ड्यूक ऑफ बुस्ल्यूच को ट्यूशन देने लगे। दो साल तक स्मिथ ने पूरे
    दो साल फ्रांस में रहने और वहां घूमने में बिताए। वे इस दौरान
    स्विट्जरलैंड भी गए। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने स्मिथ को उनके समकालीन
    वोल्तेयर, जीनजैस रोस्यू, फ्रैंकॉयस वेसने और आयनरॉबर्टजैस टरगट के
    संपर्क में ला दिया।

    ड्यूक की सेवा से मिली पेंशन मिलने के बाद स्मिथ सेवानिवृत्त होकर अपने
    जन्म स्थान कर्क हैडली लौटकर 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' लिखने में जुट गए। यह
    उसी वर्ष 1776 में प्रकाशित हुई जब अमेरिका में स्वाधीनता के घोषणा-पत्र
    पर हस्ताक्षर हुए थे। इसी साल उनके नजदीकी दोस्त डेविड ह्यूम का भी निधन
    हुआ। 1778 में कमिश्नर ऑफ कस्टम्स नियुक्त किया गया। इस नये काम ने उनको
    उलझन में डाल दिया। अब उन पर स्मगलिंग पर अंकुश की जिम्मेदारी थी, जबकि
    स्मगलिंग को अपनी किताब 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' में वे 'अस्वाभाविक' कानूनों
    के कारण जायज करार दे चुके थे। एडम स्मिथ ने शादी नहीं की। 19 जुलाई 1790
    को उनका एडिनबर्ग में निधन हो गया।

    आज स्मिथ की ख्याति उनकी इस व्याख्या के कारण है कि मुक्त बाजार वाली
    अर्थव्यवस्था में कैसे तार्किक स्वार्थ भी आर्थिक तरक्की का कारण बन सकता
    है। ये उन लोगों को चौंका सकता है जो स्मिथ को उनके नीति शास्त्र और भलाई
    पर आधारित उनके शुरूआती काम के लिए जानते हैं। वे तो उन्हें एक निष्ठुर
    व्यक्तिवादी मानते थे। वास्तविकता में यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में स्मिथ
    ने जिन विषयों पर लेक्चर दिए जैसे- प्राकृतिक धर्मशास्त्र (नेचुरल
    थियालॉजी), नीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र और अर्थशास्त्र। ये खुलासा उस
    दौरान उनके छात्र रह चुके जॉन मिलर ने किया है।

    'थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स' में स्मिथ लिखते हैं, 'इंसान को कितना भी
    स्वार्थी मान लिया जाए, लेकिन फिर भी उसके स्वभाव में ऐसे कुछ मतों के
    सबूत तो मिल ही जाते हैं, जो उसे दूसरों के हितों के लिए भी सोचने का
    मौका देते हैं और उसमें दूसरों की खुशी की अनिवार्यता का भाव भर देती
    हैं, हालांकि इससे उसे निजी तौर पर कोई फायदा तो नहीं होता, लेकिन दूसरों
    को खुश देखने का आनंद मिलता है।' दूसरी तरफ, निजी हितों को लेकर स्मिथ के
    विचारों में मृदुता भी देखने को मिलती है। वे इस विचार को नहीं मानते कि
    स्वप्रेम 'एक ऐसा मत है जो किसी भी सूरत में पवित्र नहीं हो सकता।' स्मिथ
    का तर्क था कि जिंदगी की मुश्किलें बढ़ जाएंगी अगर, 'हमारा स्नेह, जो
    हमारे मूल स्वभाव का हिस्सा है, हमारे व्यवहार को अधिकांशतया प्रभावित कर
    सकता है, किसी भी मौके पर पवित्र न लगे या इसे हर किसी से तारीफ ही
    मिले।'

    स्मिथ के लिए दयाभाव और निजी हित एक दूसरे के विरोधी नहीं थे, वे तो पूरक
    थे। 'इंसान के पास अपने लोगों की मदद के मौके निरंतर उपलब्ध होते हैं,
    लेकिन ऐसा केवल परोपकार से ही करने की सोच व्यर्थ होगी।' यह खुलासा
    उन्होंने अपनी किताब 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' में किया है।

    धर्मार्थ कार्य जहां एक नेक काम है, केवल इसी से गुजारा नहीं हो सकता। इस
    कमी को निजी हितों की पूर्ति ही पूरा कर सकती है। स्मिथ के मुताबिक,
    'किसी कसाई, बीयर बनाने वाले या बेकरी वाले के परोपकार से हम रोज रात का
    खाना हासिल करने की अपेक्षा नहीं कर सकते, बल्कि तभी कर सकते हैं जब वे
    अपने हितों का सम्मान करें।'

    अपने श्रम से पैसे कमाने वाला खुद का फायदा करता है। साथ ही वह बिना जाने
    समाज को भी फायदा पहुंचाता है। क्योंकि वह अपने श्रम का पैसा
    प्रतिस्पर्धी बाजार से कमाता है, वो दूसरों से बेहतर ऐसा काम करता है
    जिसके लिए उसे पैसा मिलता है। एडम स्मिथ की स्थायी परिकल्पना में,
    'उद्योग को उसकी कीमत के मुताबिक सक्षमता के साथ चलाने में उसका मकसद
    अपना लाभ होता है। साथ ही इसमें, अन्य कई मामलों की तरह उसे एक अनदेखे
    साथ से वह तरक्की मिल रही है, जो उसकी आकांक्षा में शामिल ही नहीं था।'

    'द वेल्थ ऑफ नेशंस' की पांच किताबों की सीरीज में किसी देश की समृद्धि और
    उसके स्वभाव का खुलासा किया गया है। स्मिथ का तर्क था कि समृद्धि का
    मुख्य कारण, श्रम का निरंतर बढ़ता विभाजन था। स्मिथ ने पिन का बहुचर्चित
    उदाहरण दिया था। उन्होंने बताया कि अगर 18 विशेषज्ञता वाले कामों में से
    प्रत्येक को किसी विशेष श्रमिक को दिया जाए तो 10 श्रमिक प्रतिदिन 48
    हजार पिनों का उत्पादन कर सकते हैं। औसत उत्पादनः 4800 पिन प्रति
    व्यक्ति प्रतिदिन। लेकिन श्रम का विभाजन मत कीजिए तो एक श्रमिक दिन भर
    में एक पिन भी बना ले तो बहुत है। सीरीज की पहली किताब इसी विषय पर
    केंद्रित है कि कैसे श्रमिक अपनी श्रमशक्ति का या अन्य संसाधनों का बेहतर
    इस्तेमाल कर सकते हैं। स्मिथ ने दावा किया कि एक व्यक्ति किसी संसाधन,
    जैसे जमीन या श्रमिक, का निवेश इसीलिए करता है, ताकि उसे बदले में ज्यादा
    से ज्यादा लाभ मिले। परिणामतः संसाधन का सभी तरह से इस्तेमाल समान लाभ
    (हर एक में मौजूद तुलनात्मक जोखिम के लिहाज से समायोजित) मिलना चाहिए।
    वरना स्थानांतरण देखने को मिलेगा।

    जॉर्ज स्टिगलर की राय में यह विचार ही आर्थिक सिद्धांत के मुख्य प्रमेय
    (प्रपोजिशन) के केंद्र में है। इसमें हैरानी की बात नहीं है. और फिर यह
    स्टिगलर के उस दावे से भी मेल खाता है कि अर्थशास्त्र में किसी भी सोच के
    जनक को उसका श्रेय नहीं मिलता, स्मिथ के विचार मौलिक नहीं थे। 1766 में
    फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टरगट इसी तरह के विचार व्यक्त कर चुके थे। स्मिथ
    ने समान लाभ की अपनी सोच के बूते इस बात का खुलासा कर दिया कि क्यों
    लोगों को अलग-अलग वेतन मिलता है। स्मिथ के अनुसार मुश्किल से सीखे जाने
    वाले काम के लिए मिलने वाला वेतन भी ज्यादा होगा, क्योंकि ज्यादा वेतन की
    संभावना नहीं होने पर लोग उस काम को सीखने में उत्साह ही नहीं दिखाएंगे।
    उनके विचारों ने ही मानव पूंजी की आधुनिक सोच को साकार किया। साथ ही उन
    लोगों को भी ज्यादा वेतन मिलेगा जो गंदे और ज्यादा जोखिम वाले कामों को
    करेंगे- जैसे कोयला खदानों में काम या कसाई का काम या फिर जल्लाद का काम
    जहां एक घृणित काम करना पड़ता है। संक्षेप में, काम में अंतर की भरपाई
    वेतन में अंतर से की जाती है। आधुनिक अर्थशास्त्री स्मिथ की इस सोच को
    'थ्योरी ऑफ कंपनसेटिंग वेज डिफरेंशियल्स' का नाम देते हैं।

    स्मिथ ने गणना के अर्थशास्त्र (न्यूमरेट इकानॉमी) का इस्तेमाल न केवल पिन
    के उत्पादन या कसाई और जल्लाद के वेतनों में अंतर को समझाने के लिए किया,
    बल्कि उनका उद्दे्श्य उस वक्त के कुछ राजनीतिक मुद्दों की ओर ध्यान
    दिलाना भी था। 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' की 1776 में प्रकाशित चौथी किताब में
    स्मिथ ग्रेट ब्रिटेन को बताते हैं कि अमेरिकी उपनिवेशों पर कब्जा फायदे
    का सौदा नहीं है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जरूरत से ज्यादा महंगे होने के
    कारणों के खुलासे से स्मिथ की आंकड़ों से खेलने की महारत का तो पता चलता
    ही है, साथ ही वह यह भी बताता है कि अर्थशास्त्र के बहुत सामान्य से
    इस्तेमाल से भी क्रांतिकारी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं

    एक महान साम्राज्य की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था ऐसे उपभोक्ता देश
    तैयार करना जो हमारे विभिन्न उत्पादकों से उनके द्वारा बनाए जा रहे हर
    सामान को खरीदें। हमारे उत्पादकों का एकाधिकार सुरक्षित रखने के लिए
    कीमतों में थोड़े से इजाफे का खामियाजा साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए
    अंततः घरेलू उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ गया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए
    पिछली दो जंग में 1.7 करोड़ से ज्यादा लोगों को काम पर लगाया गया और इससे
    पहले की जंगों में भी ऐसा होता रहा है। इस कर्ज का ब्याज ही न केवल समूचे
    असाधारण लाभ से ज्यादा है, जो औपनिवेशिक व्यापार पर एकाधिकार से कमाया
    गया था बल्कि पूरे कारोबार के मूल्य, पूरे सामान के मूल्य से भी ज्यादा
    है जो हर साल उपनिवेशों को आयात किया गया।

    स्मिथ हमेशा से वाणिज्यवाद के खिलाफ थे, जिसमें व्यापार अधिशेष (ट्रेड
    सरप्लस) को इस त्रुटिपूर्ण सोच के साथ कायम रखा जाता है कि इससे धन में
    इजाफा होता है। उनका तर्क था, कि व्यापार का मूल फायदा यह था कि इसने
    अतिरिक्त सामान के लिए नये बाजार खोल दिए और विदेशों से आने वाली चीजें
    भी घर पर सस्ती मिलने लगीं। इसके साथ ही स्मिथ ने मुक्त व्यापार के
    समर्थक अर्थशास्त्रियों की एक पीढ़ी के लिए रास्ता सा खोल दिया, जिस पर चल
    कर अगली पीढ़ी में डेविड रिकार्डो और जॉन स्टुअर्ट की तुलनात्मक लाभ के
    सिद्धांत रचे गए।

    कई बार एडम स्मिथ को एक ऐसे अर्थशास्त्री के तौर पर बताया गया जो आर्थिक
    जगत में सरकार की कोई भूमिका ही नहीं चाहते, जबकि वास्तविकता में उनका
    मानना था कि इसमें सरकार की भूमिका बहुत अहम है। मुक्त बाजार में यकीन
    रखने वाले अधिकांश आधुनिक विचारकों की तरह स्मिथ का भी यह मानना था कि
    सरकार को अनुबंधों के लिए दबाव बनाना चाहिए और नई सोच और आविष्कारों को
    प्रोत्साहित करने के लिए पेटेंट और कॉपीराइट भी देना चाहिए। उनका यह भी
    मानना था कि सरकार को सड़क और पुलों जैसे कामों को अपने पास ही रखना
    चाहिए, जो उनकी राय में निजी लोग अच्छी तरह से मुहैया नहीं करा पाएंगे।
    मजे की बात यह है कि वे यह भी चाहते थे कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल करने
    वालों से इस आधार पर वसूली की जानी चाहिए कि उन्होंने इसका कितना
    इस्तेमाल किया। यानी ज्यादा इस्तेमाल करने वाले से ज्यादा वसूली। स्मिथ
    और आधुनिक विचारकों में एक मुक्त बाजार को लेकर सबसे बड़ा अंतर यह है कि
    स्मिथ प्रतिकार दरों (रिटेलियटरी टेरिफ्स) के समर्थक थे।

    उनकी राय में दूसरे देशों की ऊंची दरों को कम करने में प्रतिकार करने का
    अच्छा असर होगा। उन्होंने लिखा था, 'एक अच्छे विदेशी बाजार की बेहतरी,
    कुछ समय के लिए कुछ सामान विशेष के लिए ज्यादा कीमत चुकाने की अस्थायी
    असुविधा की क्षतिपूर्ति कर देगी।' स्मिथ के कुछ विचार उनकी कल्पनाशक्ति
    की व्यापकता को प्रदर्शित करते हैं। आज वाउचरों और शालेय चयन कार्यक्रमों
    (स्कूल चॉइस प्रोग्राम्स) को सार्वजनिक शिक्षा के ताजातरीन सुधारों की
    संज्ञा दी जाती है। लेकिन एडम स्मिथ ने तो इस विषय की चर्चा 200 साल से
    भी ज्यादा पहले कर दी थी।

    अगर लाभार्थ संस्थानों पर निर्भर छात्रों को अपनी पसंद के कॉलेजों के चयन
    की छूट दी जाए तो इस आजादी से विभिन्न कॉलेजों में भी बेहतरी के लिए कुछ
    प्रतिस्पर्धा का भाव देखने को मिलेगा। इसके विपरीत हर एक कॉलेज से दूसरे
    कॉलेज जाने के इच्छुक छात्रों को रुकने पर मजबूर करने वाला कानून इस
    प्रतिस्पर्धा के भाव को समाप्त कर देगा।

    ऑक्सफोर्ड (1740-46) में अपने छात्र जीवन में आए अनुभवों ने, जहां वे
    शिकायत करते थे कि प्रोफेसरों ने पढ़ाने का नाटक तक करना छोड़ दिया है, एडम
    स्मिथ का हमेशा के लिए ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से मोहभंग कर दिया था।
    स्मिथ का लेखन न केवल अर्थशास्त्र के विज्ञान की पड़ताल करता है, बल्कि यह
    देशों को अपने संसाधनों को समझने में एक पॉलिसी गाइड की तरह भी था। स्मिथ
    का मानना था कि खुली प्रतिस्पर्धा के माहौल में ही सर्वश्रेष्ठ आर्थिक
    विकास हो सकता है। एक ऐसा माहौल जहां सर्वव्यापी 'प्राकृतिक नियम' से
    तालमेल रखा जाता हो। चूंकि स्मिथ उनके काल तक के सबसे ज्यादा व्यवस्थित
    और व्यापक अध्ययनकर्ता थे उनकी आर्थिक सोच मान्य अर्थशास्त्र का आधार बन
    गई। और चूंकि किसी अन्य अर्थशास्त्री की तुलना में उनकी सोच ज्यादा काल
    तक टिकी रही, इसलिए एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र के विज्ञान का आदि और अंत
    (अल्फा एंड ओमेगा) कहा जा सकता है।

    http://azadi.me

    एडम स्मिथ के चुनिंदा लेखन

    एन इन्वायरी इनटू दि नेचर एंड कॉजेस ऑफ दि वेल्थ ऑफ नेशंस, एडविन केनन
    द्वारा संपादित, 1976
    दि थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स, डी.डी. रैफेल और ए.एल. मैकफी द्वारा संपादित, 1976

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  10. [जन्म 5 जून 1723 (रूस) – निधन 17 जुलाई 1790 (न्यूयॉर्क)]

    'द वेल्थ ऑफ नेशंस' के साथ एडम स्मिथ ने खुद को समकालीन आर्थिक सोच के
    प्रमुख के तौर पर स्थापित कर लिया था। एडम स्मिथ की सोच की यही ऊर्जा
    19वीं सदी में डेविड रिकार्डो और कार्ल मार्क्स और फिर 20वीं सदी में
    कीन्स और फ्रीडमैन तक देखने को मिली।

    स्मिथ का जन्म स्कॉटलैंड के एक छोटे से गांव कर्क हैडली में हुआ था। 14
    वर्ष की उम्र में स्कॉलरशिप (जैसा कि उन दिनों प्रचलन में था) पर
    यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में दाखिले से पहले तक उनकी देखभाल विधवा मां ने
    की। बाद में उन्होंने ऑक्सफोर्ड के बेलियल कॉलेज में दाखिला ले लिया। जब
    वे स्नातक हुए तो उनके पास यूरोपियन साहित्य का अच्छा खासा ज्ञान था और
    और साथ ही था अंग्रेजी स्कूलों के लिए एक स्थायी तिरस्कार भाव। वे घर
    लौटे और कई पसंद किए गए लेक्चरों की सीरीज के बाद उन्होंने ग्लास्गो
    यूनिवर्सिटी में 1751 में 'फर्स्ट चेयर ऑफ लॉजिक' और फिर अगले साल (1752)
    में 'चेयर ऑफ मॉरल फिलासॉफी' की स्थापना की। 1764 में शिक्षा जगत छोड़कर
    वो यंग ड्यूक ऑफ बुस्ल्यूच को ट्यूशन देने लगे। दो साल तक स्मिथ ने पूरे
    दो साल फ्रांस में रहने और वहां घूमने में बिताए। वे इस दौरान
    स्विट्जरलैंड भी गए। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने स्मिथ को उनके समकालीन
    वोल्तेयर, जीनजैस रोस्यू, फ्रैंकॉयस वेसने और आयनरॉबर्टजैस टरगट के
    संपर्क में ला दिया।

    ड्यूक की सेवा से मिली पेंशन मिलने के बाद स्मिथ सेवानिवृत्त होकर अपने
    जन्म स्थान कर्क हैडली लौटकर 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' लिखने में जुट गए। यह
    उसी वर्ष 1776 में प्रकाशित हुई जब अमेरिका में स्वाधीनता के घोषणा-पत्र
    पर हस्ताक्षर हुए थे। इसी साल उनके नजदीकी दोस्त डेविड ह्यूम का भी निधन
    हुआ। 1778 में कमिश्नर ऑफ कस्टम्स नियुक्त किया गया। इस नये काम ने उनको
    उलझन में डाल दिया। अब उन पर स्मगलिंग पर अंकुश की जिम्मेदारी थी, जबकि
    स्मगलिंग को अपनी किताब 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' में वे 'अस्वाभाविक' कानूनों
    के कारण जायज करार दे चुके थे। एडम स्मिथ ने शादी नहीं की। 19 जुलाई 1790
    को उनका एडिनबर्ग में निधन हो गया।

    आज स्मिथ की ख्याति उनकी इस व्याख्या के कारण है कि मुक्त बाजार वाली
    अर्थव्यवस्था में कैसे तार्किक स्वार्थ भी आर्थिक तरक्की का कारण बन सकता
    है। ये उन लोगों को चौंका सकता है जो स्मिथ को उनके नीति शास्त्र और भलाई
    पर आधारित उनके शुरूआती काम के लिए जानते हैं। वे तो उन्हें एक निष्ठुर
    व्यक्तिवादी मानते थे। वास्तविकता में यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो में स्मिथ
    ने जिन विषयों पर लेक्चर दिए जैसे- प्राकृतिक धर्मशास्त्र (नेचुरल
    थियालॉजी), नीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र और अर्थशास्त्र। ये खुलासा उस
    दौरान उनके छात्र रह चुके जॉन मिलर ने किया है।

    'थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स' में स्मिथ लिखते हैं, 'इंसान को कितना भी
    स्वार्थी मान लिया जाए, लेकिन फिर भी उसके स्वभाव में ऐसे कुछ मतों के
    सबूत तो मिल ही जाते हैं, जो उसे दूसरों के हितों के लिए भी सोचने का
    मौका देते हैं और उसमें दूसरों की खुशी की अनिवार्यता का भाव भर देती
    हैं, हालांकि इससे उसे निजी तौर पर कोई फायदा तो नहीं होता, लेकिन दूसरों
    को खुश देखने का आनंद मिलता है।' दूसरी तरफ, निजी हितों को लेकर स्मिथ के
    विचारों में मृदुता भी देखने को मिलती है। वे इस विचार को नहीं मानते कि
    स्वप्रेम 'एक ऐसा मत है जो किसी भी सूरत में पवित्र नहीं हो सकता।' स्मिथ
    का तर्क था कि जिंदगी की मुश्किलें बढ़ जाएंगी अगर, 'हमारा स्नेह, जो
    हमारे मूल स्वभाव का हिस्सा है, हमारे व्यवहार को अधिकांशतया प्रभावित कर
    सकता है, किसी भी मौके पर पवित्र न लगे या इसे हर किसी से तारीफ ही
    मिले।'

    स्मिथ के लिए दयाभाव और निजी हित एक दूसरे के विरोधी नहीं थे, वे तो पूरक
    थे। 'इंसान के पास अपने लोगों की मदद के मौके निरंतर उपलब्ध होते हैं,
    लेकिन ऐसा केवल परोपकार से ही करने की सोच व्यर्थ होगी।' यह खुलासा
    उन्होंने अपनी किताब 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' में किया है।

    धर्मार्थ कार्य जहां एक नेक काम है, केवल इसी से गुजारा नहीं हो सकता। इस
    कमी को निजी हितों की पूर्ति ही पूरा कर सकती है। स्मिथ के मुताबिक,
    'किसी कसाई, बीयर बनाने वाले या बेकरी वाले के परोपकार से हम रोज रात का
    खाना हासिल करने की अपेक्षा नहीं कर सकते, बल्कि तभी कर सकते हैं जब वे
    अपने हितों का सम्मान करें।'

    अपने श्रम से पैसे कमाने वाला खुद का फायदा करता है। साथ ही वह बिना जाने
    समाज को भी फायदा पहुंचाता है। क्योंकि वह अपने श्रम का पैसा
    प्रतिस्पर्धी बाजार से कमाता है, वो दूसरों से बेहतर ऐसा काम करता है
    जिसके लिए उसे पैसा मिलता है। एडम स्मिथ की स्थायी परिकल्पना में,
    'उद्योग को उसकी कीमत के मुताबिक सक्षमता के साथ चलाने में उसका मकसद
    अपना लाभ होता है। साथ ही इसमें, अन्य कई मामलों की तरह उसे एक अनदेखे
    साथ से वह तरक्की मिल रही है, जो उसकी आकांक्षा में शामिल ही नहीं था।'

    'द वेल्थ ऑफ नेशंस' की पांच किताबों की सीरीज में किसी देश की समृद्धि और
    उसके स्वभाव का खुलासा किया गया है। स्मिथ का तर्क था कि समृद्धि का
    मुख्य कारण, श्रम का निरंतर बढ़ता विभाजन था। स्मिथ ने पिन का बहुचर्चित
    उदाहरण दिया था। उन्होंने बताया कि अगर 18 विशेषज्ञता वाले कामों में से
    प्रत्येक को किसी विशेष श्रमिक को दिया जाए तो 10 श्रमिक प्रतिदिन 48
    हजार पिनों का उत्पादन कर सकते हैं। औसत उत्पादनः 4800 पिन प्रति
    व्यक्ति प्रतिदिन। लेकिन श्रम का विभाजन मत कीजिए तो एक श्रमिक दिन भर
    में एक पिन भी बना ले तो बहुत है। सीरीज की पहली किताब इसी विषय पर
    केंद्रित है कि कैसे श्रमिक अपनी श्रमशक्ति का या अन्य संसाधनों का बेहतर
    इस्तेमाल कर सकते हैं। स्मिथ ने दावा किया कि एक व्यक्ति किसी संसाधन,
    जैसे जमीन या श्रमिक, का निवेश इसीलिए करता है, ताकि उसे बदले में ज्यादा
    से ज्यादा लाभ मिले। परिणामतः संसाधन का सभी तरह से इस्तेमाल समान लाभ
    (हर एक में मौजूद तुलनात्मक जोखिम के लिहाज से समायोजित) मिलना चाहिए।
    वरना स्थानांतरण देखने को मिलेगा।

    जॉर्ज स्टिगलर की राय में यह विचार ही आर्थिक सिद्धांत के मुख्य प्रमेय
    (प्रपोजिशन) के केंद्र में है। इसमें हैरानी की बात नहीं है. और फिर यह
    स्टिगलर के उस दावे से भी मेल खाता है कि अर्थशास्त्र में किसी भी सोच के
    जनक को उसका श्रेय नहीं मिलता, स्मिथ के विचार मौलिक नहीं थे। 1766 में
    फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टरगट इसी तरह के विचार व्यक्त कर चुके थे। स्मिथ
    ने समान लाभ की अपनी सोच के बूते इस बात का खुलासा कर दिया कि क्यों
    लोगों को अलग-अलग वेतन मिलता है। स्मिथ के अनुसार मुश्किल से सीखे जाने
    वाले काम के लिए मिलने वाला वेतन भी ज्यादा होगा, क्योंकि ज्यादा वेतन की
    संभावना नहीं होने पर लोग उस काम को सीखने में उत्साह ही नहीं दिखाएंगे।
    उनके विचारों ने ही मानव पूंजी की आधुनिक सोच को साकार किया। साथ ही उन
    लोगों को भी ज्यादा वेतन मिलेगा जो गंदे और ज्यादा जोखिम वाले कामों को
    करेंगे- जैसे कोयला खदानों में काम या कसाई का काम या फिर जल्लाद का काम
    जहां एक घृणित काम करना पड़ता है। संक्षेप में, काम में अंतर की भरपाई
    वेतन में अंतर से की जाती है। आधुनिक अर्थशास्त्री स्मिथ की इस सोच को
    'थ्योरी ऑफ कंपनसेटिंग वेज डिफरेंशियल्स' का नाम देते हैं।

    स्मिथ ने गणना के अर्थशास्त्र (न्यूमरेट इकानॉमी) का इस्तेमाल न केवल पिन
    के उत्पादन या कसाई और जल्लाद के वेतनों में अंतर को समझाने के लिए किया,
    बल्कि उनका उद्दे्श्य उस वक्त के कुछ राजनीतिक मुद्दों की ओर ध्यान
    दिलाना भी था। 'द वेल्थ ऑफ नेशंस' की 1776 में प्रकाशित चौथी किताब में
    स्मिथ ग्रेट ब्रिटेन को बताते हैं कि अमेरिकी उपनिवेशों पर कब्जा फायदे
    का सौदा नहीं है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जरूरत से ज्यादा महंगे होने के
    कारणों के खुलासे से स्मिथ की आंकड़ों से खेलने की महारत का तो पता चलता
    ही है, साथ ही वह यह भी बताता है कि अर्थशास्त्र के बहुत सामान्य से
    इस्तेमाल से भी क्रांतिकारी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं

    एक महान साम्राज्य की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था ऐसे उपभोक्ता देश
    तैयार करना जो हमारे विभिन्न उत्पादकों से उनके द्वारा बनाए जा रहे हर
    सामान को खरीदें। हमारे उत्पादकों का एकाधिकार सुरक्षित रखने के लिए
    कीमतों में थोड़े से इजाफे का खामियाजा साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए
    अंततः घरेलू उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ गया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए
    पिछली दो जंग में 1.7 करोड़ से ज्यादा लोगों को काम पर लगाया गया और इससे
    पहले की जंगों में भी ऐसा होता रहा है। इस कर्ज का ब्याज ही न केवल समूचे
    असाधारण लाभ से ज्यादा है, जो औपनिवेशिक व्यापार पर एकाधिकार से कमाया
    गया था बल्कि पूरे कारोबार के मूल्य, पूरे सामान के मूल्य से भी ज्यादा
    है जो हर साल उपनिवेशों को आयात किया गया।

    स्मिथ हमेशा से वाणिज्यवाद के खिलाफ थे, जिसमें व्यापार अधिशेष (ट्रेड
    सरप्लस) को इस त्रुटिपूर्ण सोच के साथ कायम रखा जाता है कि इससे धन में
    इजाफा होता है। उनका तर्क था, कि व्यापार का मूल फायदा यह था कि इसने
    अतिरिक्त सामान के लिए नये बाजार खोल दिए और विदेशों से आने वाली चीजें
    भी घर पर सस्ती मिलने लगीं। इसके साथ ही स्मिथ ने मुक्त व्यापार के
    समर्थक अर्थशास्त्रियों की एक पीढ़ी के लिए रास्ता सा खोल दिया, जिस पर चल
    कर अगली पीढ़ी में डेविड रिकार्डो और जॉन स्टुअर्ट की तुलनात्मक लाभ के
    सिद्धांत रचे गए।

    कई बार एडम स्मिथ को एक ऐसे अर्थशास्त्री के तौर पर बताया गया जो आर्थिक
    जगत में सरकार की कोई भूमिका ही नहीं चाहते, जबकि वास्तविकता में उनका
    मानना था कि इसमें सरकार की भूमिका बहुत अहम है। मुक्त बाजार में यकीन
    रखने वाले अधिकांश आधुनिक विचारकों की तरह स्मिथ का भी यह मानना था कि
    सरकार को अनुबंधों के लिए दबाव बनाना चाहिए और नई सोच और आविष्कारों को
    प्रोत्साहित करने के लिए पेटेंट और कॉपीराइट भी देना चाहिए। उनका यह भी
    मानना था कि सरकार को सड़क और पुलों जैसे कामों को अपने पास ही रखना
    चाहिए, जो उनकी राय में निजी लोग अच्छी तरह से मुहैया नहीं करा पाएंगे।
    मजे की बात यह है कि वे यह भी चाहते थे कि इन सुविधाओं का इस्तेमाल करने
    वालों से इस आधार पर वसूली की जानी चाहिए कि उन्होंने इसका कितना
    इस्तेमाल किया। यानी ज्यादा इस्तेमाल करने वाले से ज्यादा वसूली। स्मिथ
    और आधुनिक विचारकों में एक मुक्त बाजार को लेकर सबसे बड़ा अंतर यह है कि
    स्मिथ प्रतिकार दरों (रिटेलियटरी टेरिफ्स) के समर्थक थे।

    उनकी राय में दूसरे देशों की ऊंची दरों को कम करने में प्रतिकार करने का
    अच्छा असर होगा। उन्होंने लिखा था, 'एक अच्छे विदेशी बाजार की बेहतरी,
    कुछ समय के लिए कुछ सामान विशेष के लिए ज्यादा कीमत चुकाने की अस्थायी
    असुविधा की क्षतिपूर्ति कर देगी।' स्मिथ के कुछ विचार उनकी कल्पनाशक्ति
    की व्यापकता को प्रदर्शित करते हैं। आज वाउचरों और शालेय चयन कार्यक्रमों
    (स्कूल चॉइस प्रोग्राम्स) को सार्वजनिक शिक्षा के ताजातरीन सुधारों की
    संज्ञा दी जाती है। लेकिन एडम स्मिथ ने तो इस विषय की चर्चा 200 साल से
    भी ज्यादा पहले कर दी थी।

    अगर लाभार्थ संस्थानों पर निर्भर छात्रों को अपनी पसंद के कॉलेजों के चयन
    की छूट दी जाए तो इस आजादी से विभिन्न कॉलेजों में भी बेहतरी के लिए कुछ
    प्रतिस्पर्धा का भाव देखने को मिलेगा। इसके विपरीत हर एक कॉलेज से दूसरे
    कॉलेज जाने के इच्छुक छात्रों को रुकने पर मजबूर करने वाला कानून इस
    प्रतिस्पर्धा के भाव को समाप्त कर देगा।

    ऑक्सफोर्ड (1740-46) में अपने छात्र जीवन में आए अनुभवों ने, जहां वे
    शिकायत करते थे कि प्रोफेसरों ने पढ़ाने का नाटक तक करना छोड़ दिया है, एडम
    स्मिथ का हमेशा के लिए ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से मोहभंग कर दिया था।
    स्मिथ का लेखन न केवल अर्थशास्त्र के विज्ञान की पड़ताल करता है, बल्कि यह
    देशों को अपने संसाधनों को समझने में एक पॉलिसी गाइड की तरह भी था। स्मिथ
    का मानना था कि खुली प्रतिस्पर्धा के माहौल में ही सर्वश्रेष्ठ आर्थिक
    विकास हो सकता है। एक ऐसा माहौल जहां सर्वव्यापी 'प्राकृतिक नियम' से
    तालमेल रखा जाता हो। चूंकि स्मिथ उनके काल तक के सबसे ज्यादा व्यवस्थित
    और व्यापक अध्ययनकर्ता थे उनकी आर्थिक सोच मान्य अर्थशास्त्र का आधार बन
    गई। और चूंकि किसी अन्य अर्थशास्त्री की तुलना में उनकी सोच ज्यादा काल
    तक टिकी रही, इसलिए एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र के विज्ञान का आदि और अंत
    (अल्फा एंड ओमेगा) कहा जा सकता है।

    http://azadi.me

    एडम स्मिथ के चुनिंदा लेखन

    एन इन्वायरी इनटू दि नेचर एंड कॉजेस ऑफ दि वेल्थ ऑफ नेशंस, एडविन केनन
    द्वारा संपादित, 1976
    दि थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स, डी.डी. रैफेल और ए.एल. मैकफी द्वारा संपादित, 1976

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  11. एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!! ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.

    उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ? तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”
    आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!

    इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं.

    याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है ,और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है. यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए….. आप हाथी नहीं इंसान हैं.

  12. एक बार एक जंगल में बहुत ज़ोर से बारिश शुरू हो गई! सारे जंगली जानवर अपने -२ घरो में छुप गये ! जिसे जो जगह मिली वो वहाँ घुस गया! सभी जानवर सुरक्षित स्थानों में चले गये! 
    लेकिन एक छोटा सा शेर का बच्चा अपने झुंड से अलग हो गया! उसे अभी जन्म लिए ज़्यादा समय भी नहीं हुआ था! बारिश इतनी ज़ोर से हो रही थी की पूरा जॅंगल सन्नाटे की आगोश में था! 
    उस शेर के बच्चे को बारिश की वजह से ठंड भी लग रही थी! किसी पेड़ की आर में अब वह सिमट कर बैठा था! कहीं भी जाने मे अक्षम वो मायूसी से अपनी माँ को ही याद कर रहा था!
    उसी पेड़ के सामने एक चट्टान के नीचे छोटे से बिल में एक खरगोश का परिवार रहता था! बार - २ वो शेर के बच्चें की हालत देखने आते खरगोश ने कहा देखो ये शेर का बच्चा झुंड से बिछड़ गया हैं और बारिश इतनी तेज हैं की कोई इसे खोजने भी नही आ सकता! 
    ये बारिश ज़्यादा देर और हुई तो ये तो बेचारा मर जाएगा!
    उधर शेरनी भी अपने एक बच्चें को ना देख दुखी होकर मारी- २ उस जॅंगल मे घूम रही थी! कोई भी जॅंगल में दिख भी नही रहा था कि किसी को पूछे ! 
    इधर खरगोशनी उस बच्चें को देख व्याकुल हो उठी! और उसने खरगोश से कहा - हमे कुछ करना चाहिए ये तो मर जाएगा इतना छोटा सा प्यारा बच्चा हैं! 
    भगवान ना करे कभी ऐसा कुछ हमारे बच्चें के साथ हो जाए!
    खरगोश ने कहा अरे हम कर भी क्या सकते हैं अगर हम यहाँ से बाहर गये तो बारिश से मर जाएँगे या फिर अगर शेर ने देख लिया तो बारिश का भोजन का इंतज़ाम हो जाएगा उनका! 
    लेकिन शेरनी ने कहा नहीं मैं ये सब नही देख सकती आप बच्चें को देखो मैं अभी आती हूँ कह कर वो तेज बारिश मे निकल गई! 
    खरगोशनी रास्ते में पेड़ों पर निशान बनती जाती अपने दातों से जिससे पता चले की वो कहा से आ रही हैं ! 
    लेकिन खरगोशनी ना तो शेरनी को खोज पाई ओर ना शेरनी ही उसे !
    लेकिन चलते-२ जब शेरनी तक गई तो एक पेड़ की तरफ़ बैठ कर सोचने लगी अब मैं क्या करूँ?
    तभी उसकी नज़र कतार से लगे पेड़ों पर बने निशान पर गई! 
    और वो उसे देखने लगी! अरे ये तो अभी किसी ने बनाया हैं! ज़्यादा पुराना निशान नही हैं! पर किसी ने इतनी बारिश मे और  क्यूँ ये निशान बनाया हैं! 
    इसका कोई मतलब तो ज़रूर हैं! चल कर देखना चाहिए! ये सोच कर वह फिर से खड़ी हुई और अंदर से उसे लग रहा था की इससे उसे ज़रूर कुच्छ मिल जाएगा ! तेज़ी से दौड़ती वह उस तरफ़ हो चली!

    इधर खरगोशनी निशान बनाने और भीगने की वजह से काफ़ी बहुत ज़्यादा थक चुकी थी पर वो अपना काम कर रही थी! इधर जब  आख़िरी पेड़ पर जब शेरनी भूचि तो उसके खुशी का ठिकाना ना रहा! उसे उसका बच्चा मिल चुका था! पर उसे ये समझ नही आ रहा था की ये निसान किसने बनाए ओर ये सहायता किसने की!

    इधर खरगोशनी निशान बनाने और भीगने की वजह से काफ़ी बहुत ज़्यादा थक चुकी थी पर वो अपना काम कर रही थी! इधर जब  आख़िरी पेड़ पर जब शेरनी भूचि तो उसके खुशी का ठिकाना ना रहा! उसे उसका बच्चा मिल चुका था! पर उसे ये समझ नही आ रहा था की ये निसान किसने बनाए ओर ये सहायता किसने की!
    खरगोश ये सब देख रहा था अब उससे नही रहा गया उसने सोचा जो भी हो मे जाकर सब बता दूँगा मुझे मार कर खाना हो तो खा ले वो!
    खरगोश बाहर निकला और ष्रणी को जाकर सारी बात बता दी!
    शेरनी बोली तुम्हारी खरगोशिनी ने मेरी सहायता की हैं वो बहुत बहादुर हैं मैं अभी उसे खोज कर ले आती हूँ! वो इसी निशान वाले रास्टेन में ही होगी! 
    और शेरनी फिर से पलट कर उस तरफ़ भागी! और देखा तो उसकी आँखें भर आई! खरगोशनी अधमरी सी हालत मे भी पेड़ों पर निसान बना रही थी!
    उसके पास जाकर शेरनी ने उसे चूम लिया और बोली माँ तो माँ ही होती हैं चाहे मैं हूँ या तुम! 
    चलो तुम्हरा ये काम सफल हो गया आज तुम्हारी वजह से मुझे मेरा बच्चा वापस मिल गया वरना इतना बड़े जॅंगल मे मैं उसे ना खोज पाती! 
    और उसने उसे मुँह मे दबा कर उसके घर तेज़ी से लौट गई!

    शिक्षा - कोई भी काम अगर निष्ठा और विश्वास के साथ किया जाए तो ज़रूर सफल होता हैं! और हर माँ एक ही जैसी होती हैं वो अपने बच्चों के लिए जान की बाज़ी लगा देती हैं!


  13. एक दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर भ्रमण करने और वहाँ पर रहने वाले लोगों को देखने की इच्छा माता लक्ष्मी को बतायी ।  तो माता लक्ष्मी ने कहा कि हे प्रभु मैं भी आपके साथ चल सकती हूँ क्या ।  तब विष्णु भगवान ने एक मिनट सोचा और कहा कि ठीक है चलो परन्तु एक शर्त है ।  तुम उत्तर दिशा की तरफ नहीं देखोगी ।

    माता लक्ष्मी ने अपनी सहमति दे दी और वे शीघ्र ही पृथ्वी पर भ्रमण के लिये निकल गये ।  पृथ्वी बहुत ही सुन्दर दिख रही थी और वहाँ पर बहुत ही शान्ति थी ।  देखते ही माता लक्ष्मी बहुत ही खुश हुई और भूल गयी कि भगवान विष्णु ने उनसे क्या कहा था ।  वह उत्तर दिशा में देखने लगी ।  तभी उन्हें बहुत ही खुबसूरत फूलों का एक बगीचा दिखा जहाँ पर बहुत ही सुन्दर खुशबू आ रही थी ।  वह एक छोटा सा फूलों का खेत था ।  माता लक्ष्मी बिना सोचे ही उस खेत पर उतरी और वहाँ से एक फूल तोड़ लिये ।  

    भगवान विष्णु ने जब यह देखा तो उन्होंने माता लक्ष्मी को अपनी भूल याद दिलायी ।  और कहा कि किसी से बिना पूछे कुछ भी नहीं लेना चाहिये ।  इस पर भगवान विष्णु के आँसू आ गये ।

    माता लक्ष्मी ने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान विष्णु से माफी माँगी ।  तब भगवान विष्णु बोले कि तुमने जो भूल की है उसके लिये तुम्हें सजा भी भुगतनी पड़ेगी ।  तुम जिस फूल को बिना उसके माली से पूछे लिया है अब तुम उसी के घर में 3 साल के लिये नौकरानी बनकर उसकी देखभाल करोगी ।  तभी मैं तुम्हें बैकुण्ड में वापिस बुलाऊंगा ।

    माता लक्ष्मी एक औरत का रुप लिया और उस खेत के मालिक के पास गयी ।  मालिक का नाम माधवा था ।  वह एक गरीब तथा बड़े परिवार का मुखिया था ।  उसके साथ उसकी पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियां एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थी ।  उनके पास सम्पत्ति के नाम पर सिर्फ वही एक छोटा सा भूमि का टुकड़ा था ।  वे उसी से ही अपना गुजर बसर करता था ।  

    माता लक्ष्मी उसके घर में गयी तो माधवा ने उन्हें देखा और पूछा कि वह कौन है ।  तब माता लक्ष्मी ने कहा कि मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं है मुझ पर दया करो और मुझे अपने यहाँ रहने दो मैं आपका सारा काम करुँगी ।  माधव एक दयालु हृदय का इनसान था लेकिन वह गरीब भी था,  और वह जो कमाता था उसमें तो बहुत ही मुश्किल से उसी के घर का खर्चा चलता था परन्तु फिर भी उसने सोचा कि यदि मेरे तीन की जगह चार बेटियाँ होती तब भी तो वह यहाँ रहती यह सोचकर उसने माता लक्ष्मी को अपने यहाँ शरण दे दी ।  और इस तरह माता लक्ष्मी तीन साल तक उसके यहाँ नौकरानी बनकर रही ।  

    जैसे ही माता लक्ष्मी उसके यहाँ आयी तो उसने एक गाय खरीद ली और उसकी कमाई भी बढ़ गयी अब तो उसने कुछ जमीन और जेवर भी खरीद लिये थे और इस तरह उसने अपने लिये एक घर और अच्छे कपड़े खरीदे ।  तथा अब हर किसी के लिये एक अलग से कमरा भी था ।

    इतना सब मिलने पर माधव ने सोचा कि यह सब कुछ मुझे इसी औरत (माता लक्ष्मी) के घर में प्रवेश करने के बाद मिला है वही हमारे भाग्य को बदलने वाली है ।  2.5 साल निकलने के बाद माता लक्ष्मी ने उस घर में प्रवेश किया और उनके साथ एक परिवार के सदस्य की तरह रही परन्तु उन्होंने खेत पर काम करना बन्द नहीं किया ।  उन्होनें कहा कि मुझे अभी अपने 6 महीने और पूरे करने है ।  जब माता लक्ष्मी ने अपने 3 साल पूरे कर लिये तो एक दिन की बात है कि माधव अपना काम खत्म करके बैलगाड़ी पर अपने घर लौटा तो अपने दरवाजे पर अच्छे रत्न जड़ित पोशाक पहने तथा अनमोल जेवरों से लदी हुई एक खुबसूरत औरत को देखा ।  और उसने कहा कि वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी है ।

    तब माधव और उसके घर वाले आश्चर्य चकित ही रह गये कि जो स्त्री हमारे साथ रह रही थी वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी स्वयं थी ।  इस पर उन सभी के नेत्रों से आँसू की धारा बहने लगी और माधवा बोला कि यह क्या माँ हमसे इतना बड़ा अपराध कैसे हो गया ।  हमने स्वयं माता लक्ष्मी से ही काम करवाया ।

    माता हमें माफ कर देना ।  तब माधव बोला कि हे माता हम पर दया करो ।  हममे से कोई भी नहीं जानता था कि आप माता लक्ष्मी है ।  हे माता हमें वरदान दीजिये ।  हमारी रक्षा करिये ।

    तब माता लक्ष्मी मुस्कुरायी और बोली कि हे माधव तुम किसी प3कार की चिन्ता मत करो तुम एक बहुत ही दयालु इनसान हो और तुमने मुझे अपने यहाँ आसरा दिया है उन तीन सालों की मुझे याद है मैं तुम लोगों के साथ एक परिवार की तरह रही हूँ ।  

    इसके बदले में मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि तुम्हारे पास कभी भी धन की और खुशियों की कमी नहीं होगी ।  तुम्हें वो सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो ।

    यह कहकर लक्ष्मी जी अपने सोने से बने हुये रथ पर सवार होकर बैकुण्ठ लोक चली गयी ।

    यहाँ पर माता लक्ष्मी ने कहा कि जो लोग दयालु, और सच्चे हृदय वाले होते है मैं हमेशा वहाँ निवास करती हूँ ।  हमें गरीबों की सेवा करनी चाहिये ।  

    इस कहानी यह उपदेश है कि जब छोटी सी गलती पर भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को भी सजा दी तो हम तो बहुत ही मामूली इनसान है ।  फिर भी भगवान की हमेशा हम पर कृपा बनी रहती है ।  हर किसी इनसान को दूसरे इनसान के प्रति दयालुता का भाव रखना चाहिये हमें जो भी कष्ट और सुख मिल रहे है वह हमारे पुराने जन्मों के कर्म है ।

    अतः अन्त में यही कहना चाहूँगी कि हर किसी को भगवान पर श्रद्घा और सबुरी रखनी चाहिये अन्त में वही हमारी नैया पार लगाते है ।

  14. यदि कड़ी मेहनत इच्छा शक्ति मजबूत हो तो कोई काम मुश्किल नहीं होता। यह
    बात सिंगापुर में रह रहे 59 वर्षीय एड्रिन लोई पर बिल्कुल सटीक बैठती है।
    एड्रिन लोई सिंगापुर में या कुन कॉफ इंटरनेशनल के कार्यकारी अध्यक्ष हैं
    और वह यहां के 'कॉफी किंग' भी हैं। उनकी सफलता की कहानी जितनी दिलचस्प है
    उतनी हैरान करने वाली भी है।

    एक चीनी-सिंगापुरी परिवार के अपने सात भाई-बहनों में सबसे छोटे लिंग अपने
    पिता आह कून की मशहूर कॉफी की दुकान पर भाई-बहनों के साथ काम करते हुए
    बड़े हुए।

    एक अंग्रेजी समाचार वेबसाइट में प्रकाशित खबर के मुताबिक, करीब 60 साल तक
    दुकान चलाने के बाद कुन बीमार पड़ गए. तब लोई को लगा कि अगर पैतृक व्यवसाय
    बंद हो गया तो, यह काफी शर्मनाक होगा। उनके सब भाई-बहन उनसे आयु में बड़े
    थे। उनकी सबसे बड़ी बहन उनसे 20 साल बड़ी थीं, लेकिन वो व्यवसाय चलाने की
    इच्छुक नहीं थीं।

    लोई ने अपने पिता और ग्राहकों के बीच के सहज संबंध को देखा था। इसलिए वो
    इसे जिंदा रखना चाहते थे। एक दिन वो और उनके भाई एलगी ने हिम्मत कर पिता
    से पूछा कि क्या वो उनकी दुकान को चला सकते हैं। उनके पिता न कहा, हां
    क्यों नहीं, लेकिन यह बहुत ही मुश्किल काम है। इसका जवाब दोनों भाइयों ने
    हां में दिया।

    साल 1998 में दुकान का कार्यभार संभालने के बाद ही उन्हें लाऊ पा सैट के
    निर्माण की वजह से उन्हें दुकान को कहीं और ले जाना पड़ा। इसके बाद
    उन्होंने अपनी दुकान का नाम बदलकर या कुन काया टोस्ट कर दिया और उसे
    चलाने के लिए 10 हजार सिंगापुरी डॉलर उधार लिया।

    अच्छा-खासा पैसा खर्च कर एक हजार वर्ग फुट की नई दुकान लेने से वो काफी
    चिंतित थे। शुरुआती सफलता के बाद उन्होंने यह जानने के लिए कि कंपनी के
    विकास के लिए बाहरी निवेश की जरूरत है या नहीं एक कंसल्टेंट की सेवाएं
    लीं। दुकान पर अपना मालिकाना हक थोड़ा कम करने की जगह सिंगापुर सरकार से
    मदद के लिए आवेदन करने का फैसला लिया। एक भागीदार और भाई की हिस्सेदारी
    कम करने के बाद इस समय उनकी 75 फीसदी हिस्सेदारी है।

    युवावस्था में एड्रिन लोईसरकारी सहायता ने उन्हें फ्रेंचाइजी खोजने में
    मदद की। छह महीने में ही उनके पास चार सौ आवेदन आए। इसके बाद से वो अबतक
    सिंगापुर में 50 या कुन काफी शॉप और दुनिया के अन्य देशों में 49 दुकानें
    खोल चुके हैं। पिछले साल उनकी कंपनी ने ढाई करोड़ सिंगापुरी डॉलर का
    कारोबार किया। यह 1998 में लोई के दुकान संभालने के समय के कारोबार से
    करीब दो हजार फीसद अधिक है।

    लोई कहते हैं, 'सिंगापुर में अधिकांश लोग एक दिन में पांच बार खाते हैं,
    इसमें शामिल होता है, नाश्ता, दोपहर का खाना, दोपहर बाद की चाय, शाम का
    खाना और रात का खाना। इसलिए वो हर बार कॉफी के लिए आते हैं।'

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  15. एक लड़का आम के वृक्ष पर पत्थर मारकर आम तोड़ने का प्रयास कर रहा था।
    गलती से एक पत्थर अपने लक्ष्य से भटककर वहां से गुजर रहे राजा को लगा।
    राजा के सैनिकों ने दौड़करउस लड़के को पकड़ लिया और उसे राजा के समक्ष
    प्रस्तुत किया ।

    राजा ने कहा -"इसके लिए तुम सजा के भागीदार हो। ............ताकि फिर कभी
    कोई राजा के ऊपर पत्थर फेंकने की हिम्मत न करे, अन्यथा ऐसे तो शासन चलाना
    मुश्किल हो जाएगा।"

    लड़के ने विनयपूर्वक उत्तर दिया - "हे वीर एवं न्यायप्रिय राजन, जब मैंने
    आम के वृक्ष पर पत्थर मारा तो मुझे उपहार स्वरूप मीठे रसीले फल खाने को
    मिले और जब आपको पत्थर लगा तो आप मुझे दंड दे रहे हैं....आप से भला तो
    वृक्ष है।"

    राजा का सिर शर्म से झुक गया।

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  16. एक बार एक शेर और एक आदमी साथ-साथ यात्रा कर रहे थे। उनके मध्य यह बहस
    होने लगी कि कौन ज्यादा ताकतवर और श्रेष्ठ है। उनके मध्य नोक-झोंक तीखी
    हुई ही थी कि वे चट्टान पर उकेरी गयी एक मूर्ति के पास से गुजरे जिस में
    एक आदमी को शेर का गला दबाते हुए दर्शाया गया था।

    "वो देखो। हमारी श्रेष्ठता को साबित करने के लिए क्या तुम्हें और किसी
    प्रमाण की आवश्यकता है?" - आदमी ने गर्व से कहा।

    शेर ने उत्तर दिया - "ये कहानी कहने का तुम्हारा नजरिया है। यदि हम लोग
    शिल्पकार होते तो शेर के एक पंजे के नीचे बीस आदमी दबेहोते।"

    "इतिहास सिर्फ विजेताओं द्वारा ही लिखा जाता है।"

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  17.    

    Writer......HARESH KUMAR SAINI

    Mobile No..9478597326
      
    E-Mail..hareshsaini6@gmail.com



  18. अयोध्या में चूड़ामणि नामक एक क्षत्रिय रहता था। उसे धन की बहुत तंगी थी।
    उसने भगवान महादेवजी की बहुत समय तक आराधना की। फिर जब वह क्षीणपाप हो
    गया, तब महादेवजी की आज्ञा से कुबेर ने स्वप्न में दर्शन दे कर आज्ञा दी
    कि जो तुम आज प्रातःकाल और क्षौर कराके लाठी हाथ में लेकर घर में एकांत
    में छुप कर बैठोगे, तो उसी आँगन में एक भिखारी को आया हुआ देखोगे।

    जब तुम उसे निर्दय हो कर लाठी की प्रहारों से मारोगे तब वह सुवर्ण का
    कलश हो जाएगा। उससे तुम जीवनपर्यन्त सुख से रहोगे। फिर वैसा करने पर वही
    बात हुई। वहाँ से गुजरते हुए नाई ने यह सब देख लिया। नाई सोचने लगा--
    अरे, धन पाने का यही उपाय है, मैं भी ऐसा क्यों न करूँ?

    फिर उस दिन से नाई वैसे ही लाठी हाथ में लिए हमेशा छिप कर भिखारी के आने
    की राह देखता रहता था। एक दिन उसने भिखारी को पा लिया और लाठी से मार
    डाला। अपराध से उस नाई को भी राजा के पुरुषों ने मार डाला।

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  19. एक बार एक महिला की कार ख़राब हो गयी.
    उसे सूझ नहीं रहा था की क्या करें.
    वो बहुत ही देर तक वहाँ वेट करती रही की कोई आकर
    उसकी मदद कर दे.
    तभी वहाँ से एक आदमी जा रहा था.
    वो बहुत ही गरीब लग रहा था और भूखा भी. वो अपनी साइकिल से उतरा और उस महिला की और
    बढ़ा. महिला बूढी थी. उसे डर लग रहा था की कही ये
    आदमी उसे
    नुकसान पहुंचाने तो नहीं आ रहा है. तभी वो आदमी उसकी Mercedes गाड़ी के आगे खड़े
    हो गया.
    वो धीरे से बोला की मैडम आप क्यों नहीं गाड़ी में बैठ
    जाती है.
    बाहर बहुत ठण्ड है.
    तब तक मैं आपकी गाड़ी को देख लेता हूँ. और मेरा नाम Bryan Anderson हैं.
    महिला को थोड़ी शांति मिली.
    आदमी ने देखा की गाड़ी का केवल टायर पंक्चर
    हो गया हैं. पर उस बूढी महिला के लिए तो ये
    भी बड़ी समस्या थी.
    उसने टायर बदलने का कार्य शुरू कर दिया. और कुछ
    ही देर में नया टायर भी लगा दिया. अब बस उसके नट-वोल्ट कसने थे.
    तभी महिला ने खिड़की से बहार झाँका और
    कहा की "मुझे अगले शहर जाना है. यहाँ से बस गुज़र
    रही थी. तभी गाड़ी ख़राब हो गयी."
    उसने Bryan का बहुत ही धन्यवाद किया.
    उसे पता था की अगर वो नहीं आता तो उसे
    कितनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता. जल्द
    ही उसने टायर बदल दिया. महिला ने उससे पूछा "तुम्हारे कितने पैसे हुए बेटा?"
    वो इस समय Bryan जो मांगता उसे देने के लिए तैयार
    थी.
    क्योकि उसने पहले ही सारी डरावनी घटनाओं के बारे
    में सोच लिया था जो हो सकती थी. पर Bryan
    की मदद से ऐसा कुछ नहीं हुआ. वो उसकी आभारी थी. पर Bryan ने ऐसा कुछ नहीं
    सोचा था. वो तो बस
    उसकी मदद करने आया था. उसे याद था की जिंदगी में कितनी ही बार लोगों ने
    उसकी मदद की थी. और उसकी जिंदगी अभी तक ऐसे
    ही चलती आई थी. निस्वार्थ मदद लेकर और मदद देकर.
    उसने पैसो के बारे में कभी सोचा भी नहीं था. चाहे
    उसे इनकी कितनी भी जरुरत क्यों न हो. उसने कहा " मुझे आपके पैसे नहीं
    चाहिए मैडम, पर अगर
    आपको अगली बार ऐसा कोई व्यक्ति दिखे जिसे
    आपकी सहायता की जरुरत हो. तो उस समय
    कभी पीछे मत हटीयेगा. तब आप मुझे याद करके मदद कर
    देना. जिंदगी ही आखिर सहयोग पर टिकी हैं." ये कहकर वो चला गया. और महिला
    भी अपने सफ़र पर
    चल दी.
    रास्ते भर वो यही सोचती रही की ऐभी लोग होते है
    जो निस्वार्थ भाव से अनजाने लोगों की मदद कर
    जाते हैं. थोड़ी रात को वो एक पेट्रोल पंप के पास से
    गुजरी. पास ही में एक होटल भी था. उसने सोचा की कुछ खाने के बाद बाकि का सफ़र तय
    किया जाए. बाहर बारिश हो रही थी. जब वो होटल में गयी. तो एक लड़की, जो करीब
    26-28 की होगी,
    अपनी प्यारी मुस्कान के साथ उसके पास आई. और उसे
    अपने बाल पोछने के लिए टॉवेल दिया.
    उस लड़की की मुस्कान बनावटी नहीं थी.
    बूढी महिला ने देखा की वो लड़की करीब ८महीने की pregnant थी.
    उसे देखकर हैरानी हुई की इस हालात में
    वो अपनी परेशानियों की परवाह किये बगेर कैसे उसके
    और बाकि customers के साथ इतना अच्छा व्यवहार
    कर रही हैं. और तभी उसे ब्रायन की याद आई. बूढी महिला ने उसे अपना आर्डर
    दिया. और खाने के
    बाद आने पर पैसे 100 डॉलर उसे दे दिए. जब
    लड़की बाकि के पैसे लौटाने आई.
    तो वो महिला वहां नहीं थी. वो सोचने
    लगी की कहाँ जा सकती है.
    तभी उसे टेबल पर पड़े napkin पर कुछ लिखा मिला. उसे पड़कर उसकी आँखों में
    आंसू आ गए. उसमे लिखा था, "
    तुमे ये पैसे रख लों. कभी किसी ने मेरी भी मदद की थी.
    और अब मेरा फ़र्ज़ बनता है की मैं तुम्हारी मदद करू.
    मेरी बस यही विनती है की तुम इस चैन को यही मत
    टूटने देना. इसे आगे
    बढ़ाना. जरूरतमंद की मदद करना…" और इसके साथ
    ही 400 डॉलर और रखे हुए थे. वो महिला का शुक्रिया करने लगी. उसे और उसके
    पति को इन पैसो की सख्त जरुरत थी. क्योंकि अगले
    महीने ही उनके यहाँ बच्चे
    की संभावना थी… वो होटल का सारा काम करके घर
    पर लौटी. और बिस्तर पर आकर अपने पति के पास लेट
    गयी. उसे ख़ुशी थी की अब उन्हें ज्यादा चिंता करने
    की जरुरत नहीं हैं. उसके पति कई दिनों से परेशान थे.
    उसने अपने पति के गालो को धीरे से चुमते हुए कहा.. सब कुछ ठीक हो जायेगा.
    I love you Bryan
    Anderson. " एक पुरानी कहावत हैं. " जैसा हम करते है
    वैसा ही हमें मिलता हैं… " मैं, आप, हम सभी इस
    कहानी से बहुत कुछ सिख चुके हैं…

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  20. किसी राजा के पास एक बकरा था. एक बार उसने एलान किया कि
    जो कोई मेरे इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा, मैं उसे आधा राज्य
    दे दूंगा. किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद
    करूँगा. इस एलान को सुनकर एक आदमी राजा के पास आकर कहने लगा कि बकरा को
    चराकर उसका पेट भरना कोई बड़ी बात नहीं है. वह बकरे को जंगल में ले गया
    और पूरा दिन उसे चराता रहा. शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर
    सोचा कि दिनभर इसने इतनी घास खाई है अब तो इसका पेट भर गया होगा. अब इसे
    राजा के पास ले चलना चाहिए. बकरे को लेकर वह राजा के पास गया. राजा ने
    थोड़ी-सी हरी घास बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा. इसपर राजा ने
    उस आदमी से कहा – "तुमने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों
    खाने लगता." बहुतों ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्योंही
    दरबार में उसके सामने घास डाली जाती कि वह खाने लगता. एक होशियार व्यक्ति
    ने सोचा - इस एलान का कोई रहस्य है, तत्व है. मैं एक युक्ति से काम
    लूँगा." वह बकरे को चराने के लिए ले गया. जब भी बकरा घास खाने के लिए
    जाता तो वह उसे लकड़ी से मार देता. पूरे दिन में ऐसा कई बार हुआ. अंत में
    बकरे ने सोचा कि यदि मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी.
    शाम को वह होशियार व्यक्ति बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा. बकरे को उसने
    बिलकुल घास नहीं खिलाई थी फिर भी राजा से कहा, मैंने इसको भरपेट खिलाया
    है. अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा. कर लीजिये परीक्षा. राजा से घास
    डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाना तो दूर उसे न ही देखा न ही सूंघा. बकरे
    के मन में यह बात बैठ गयी थी कि यदि घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी. अत: उसने
    घास नहीं खाई.

    यह बकरा हमारा मन ही है. बकरे को घास चराने ले जाने वाला जीवात्मा है.
    राजा परमात्मा है. मन को मारो, मन पर अंकुश रखो. मन सुधरेगा तो जीवन
    सुधरेगा. मन को विवेकरूपी लकड़ी से रोज पीटो. भोग से जीव तृप्त नहीं हो
    सकता. भोगी रोगी होता है. भोगी की भूख कभी शांत नहीं होती. त्याग में ही
    तृप्ति समाई हुई है.


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